कसमसाते विचार, घुटती साँसे, एक कसक कुछ न कर पाने की, खुद से करते अनगिनत सवाल, बेड़ियों के बंधन की यह पीड़ा, दबी सिसकती हुई यह चुप्पी। यही है अंतर्मन का द्वंद्व। समाज की सच्चाई का प्रतिबिंब हूँ, रही विवशता मेरे व्याकुल मन की, अनचाहे ढंग से कह दी अनकही बात, वेदना का स्वर क्यूं कर कचोट रहा, भीतर तमस घनघोर गहरा गया। यही है अंतर्मन की व्याकुलता। बदलती जिंदगी मुझे जीना सीखा रही, हुआ कलुषित विकारों का प्रस्थान, सच-झूठ के फर्क का हो रहा है ज्ञान, भीतर की आवाज कर रही सजग, अब आँखे मूंद, उसे सुन ही लूँगी। मेरे अंतर्मन की आवाज।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !