वर्षा थमे बीते दिन चार , भीगी -भीगी सी है दिवार | टंगी हुई अम्मा-बाबा की तस्वीर , सील गई ,हुए कागज़ तार-तार | दिखाया एक खेल कुदरत ने, पिछवाड़े के मैदान में | खरपतवार ने फैलाया जाल, निर्जन भू ने ओढ़ी हरी शॉल | ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !