आज अखबार में पढ़ा - मन बहुत विचलित और आक्रोशित हुआ | स्कूल की बस का ड्राइवर इअरफोन पर गाना सुनते हुए बस चला रहा था | मानव रहित क्रोसिंग पर से बस को ले जाते वक्त आती हुई ट्रेन को देख कर भी जल्दबाजी में पटरी पार करने की कोशश की | आश्चर्य की बात यह कि पटरी के पास गुजर रहे एक कर्मचारी के चिल्लाने पर भी ड्राईवर ने बस नहीं रोकी | खुली आँखों से अनहोनी जान कर भी उसने अपनी और बच्चों की जान दांव पर लगा दी , भला इयरफोन लगे बंद कानों से उस कर्मचारी की आवाज कैसे सुन पाता ! बस , बहुत बड़ा हादसा हो गया | सभी असमय काल के आगोश में आ गए | दर्दनीय स्थिति उन अभिभावकों की हो गई , जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए एक सुरक्षित हाथ चुना था | एक लापरवाही से या यूँ कहे जानबूझ कर की गई गलती से कई घर के आँगन सूने हो गए | इयरफोन...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !