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Showing posts from February, 2019

वीरांगना

            पुलवामा अटैक में नीरज राठौड़ शहीद हो गए। श्रीमती रेणू नीरज राठौड़ अब एक शहीद की पत्नी वीरांगना रेणू नीरज चौधरी कहलाने लगी। 15 दिन में ही जीवन अर्थहीन लगने लगा, पूरा जीवन कैसे कटेगा? विवाह को 10 वर्ष हुए। आठ वर्ष का बेटा और दो वर्ष की बेटी, घर में सास-ससुर।             सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में लगातार शिरकत करती रेणू अब घबराने लगी है। मंचों पर तो ये नेता देशनिष्ठा से लबरेज रहते, पर कार्यक्रम निपटते ही सड़कों पर अपना अलग नजारा पेश करते। स्टेज पर वक्ताओं के मुख से पति की शहादत के प्रति सहानुभूति वाले निकले शब्द आंसुओं को रोक नहीं पाते। महिला संस्था या समाज सेवी संस्था के लोग जब ढाढस बांधते, बच्चों को पुचकारते, तो सभी शुभचिंतक और अपने से जान पड़ते। इन संस्थाओं ने रेणू को एक रॉल-मॉडल बना दिया है, उनकी परिभाषा के अनुसार पति की मौत के बावजूद वह सांसारिक तौर पर बिखरी नहीं है। देशभक्ति की लम्बी-चौड़ी तकरीरों को सुन खुद फख्र महसूस करती , पर घर में घुसते ही ऐसा जान पड़ता, मानो एक खंडहर में खड़ी है। अपनी हमउम्र  महिल...

बातें हैं बचपन से पचपन तक की

बातें हैं बचपन से पचपन तक की, दिल-ओ-जेहन में बसी मीठी कड़वी यादों की। तब से अब तक भाग रही जिंदगी यूँ हीं, सुख का छोर मानों छूट गया कहीं। तब वाले इतवार अब नहीं आते, साथ बैठ अब हम नहीं बतियाते। टी वी पर 'रामायण, महाभारत'अब नहीं आते, छत पर एंटीना घुमाने अब नहीं जाते। 'चील उड़, घोड़ा उड़' में ठहाके लगना, लेंस से कागज जला- बहादुर बनना। पोसम्पा, पिठ्ठू गरम में यारों को मात देना, 'इमला' में शत प्रतिशत अव्वल आना। चवन्नी की कुल्फियों से शहंशाह होना, पेड़ पर चढ़ आम चुराना। दोस्तों से नाराजगी के नाम पर कट्टी होना, दो उंगलियाँ जोड़ दोस्ती शुरू करना। दूध के भगौने की खुरचन में बीता बचपन, हंसते-रोते बीत गया यह बचपन। पड़ोसी के फोन से जुड़ा मोहल्ला, सुख दुख का साथी था पूरा मोहल्ला। यादों के झरोखे से पहुंची पचपन में, बच्चा बन जाने को तड़प उठ रही मन में। जीवन की छांह सिमट रह गई नसीब में, खोए पल पुनः जीने की चाह रह गई ख्वाब में। सुंदर राइटिंग खो गई कंप्यूटर में, पत्रों का नशा हुआ काफूर ईमेल में। जेब में दो मोबाइल, पर संवाद नहीं, आज दोस्तों के पास घड़ी है, पर ...