उसका नाम नीरव है, मतलब-शांत, शब्द रहित। परंतु यार दोस्त उसे 'पॉपकॉर्न' नाम से ही पुकारते हैं। नीरव को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आता है और मुंह फुला लेता है। मानो एक पिचका हुआ मक्के का दाना फूल कर पॉपकॉर्न बन गया हो। कभी कभी तो उस से बात करने में भी डर लगता। घर में भी नीरव के स्वभाव से सब परेशान हैं। कभी खाना पसंद नहीं आया, पापा की कोई बात सही नहीं लगी, भाई ने उसकी कलम ले ली, बस गुस्सा होने का मौका मिलना चाहिए। माँ तो प्रायः कहा करती- 'नीरव ने शांति से खाना खा लिया, तो समझो घर के सभी सदस्यों ने खा लिया।' आज गाँव से ताऊ आने वाले हैं। नीरव के पिता के 'ताऊ' , यूं कहा जाय- 'जगत ताऊ'। बड़े ही सुलझे और आधुनिक विचारों के इंसान और सभी के शुभचिंतक। आदेश हुआ-कॉलेज के बाद नीरव ही ताऊ को लाने स्टेशन जाएगा। ट्रेन समय पर आ गई। ताऊ के साथ प्लेटफॉर्म से बाहर निकला- एक भिखारी बच्चे ने नीरव के आगे हाथ फैला दिए। नीरव गुस्से में चिल्लाने लगा- 'यही काम है, जब देखो हाथ पसार लेते हो।' इतने मैं एक दोस्त ने कंधे पर हाथ रखा, बोला-...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !