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Showing posts from April, 2018

सांध्य-वेला

          देवीलाल को अपने मकान के लॉन में बैठना बहुत पसंद है । सड़क पर आते जाते लोग दिखते रहते हैं। परिचितों से राम-रामी हो जाया करती है। यहीं से मकान के ऊपरी हिस्से में रह रहे किरायेदार की बच्ची की चुहलबाजी कानों में पड़ती रहती है। पांच वर्षों से सचिन और सारिका किरायेदार के रूप में रह रहे हैं। दोनों सरल और सहायक स्वभाव के युवा दंपत्ति हैं , 3 वर्ष की बच्ची है। देवीलाल को इन्हें कभी किसी बात के लिए टोकना नहीं पड़ा। पिछले वर्ष पत्नी रुक्मणी का देहांत हुआ , तब से देवीलाल बहुत अकेले पड़ गए। इन दोनों ने ही संभाला। बेटा राजेश और बहू तो दो ही दिन रुके। पत्नी का 50 वर्ष का साथ छूटा, देवीलाल के लिए एकाकी जीवन काटना दूभर हो गया था। आहत जीवन को सहारा देने के बजाय राजेश छोड़कर चला गया। भला हो सचिन सारिका का, 'बाबूजी-बाबूजी' कह-कह कर आस पास ही रहे, हमदर्द और सेवा से ओतप्रोत रहे।           फोन की घंटी बजी। देवीलाल ने फोन उठाया, उस तरफ राजेश ही था- "पापा कैसे हो?" "ठीक हूँ।" "पापा, माँ के जाने के बाद इतने बड़े मकान में मन कैसे लगता होगा! क्यों न आप वहाँ...

बेबसी

          "मां , छुट्टियाँ शुरू हो गई, सेठ जी की बेटी कब आएगी ? जाते वक्त अपने बच्चों के कपड़े , किताबें मुझे दे जाती हैं । मुझे बहुत अच्छा लगता है ।" सीता -" नहीं, इस वर्ष छुट्टियों में उनकी बेटी नहीं आएगी। सेठ जी का परिवार ही उनके पास जा रहा है-दो महीने के लिए। " माँ-बेटी की बातें रामेश्वर सुन रहा था, सकपका गया-"तो क्या 2 महीने उनके घर पर कोई नहीं रहेगा ?" घड़ी की ओर देखते हुए सीता ने लक्ष्मी को स्कूल जाने के लिए कहा । सीता -" हाँ, सेठानी जी ने कहा है-2 महीने घर बंद रहेगा, तो कामह भी नहीं रहेगा। वे उन 2महीनों की तनख्वाह भी नहीं देंगी।" "सीता, इस तरह तो बहुत परेशानी हो जाएगी। हम गरीबों के तो तनख्वाह पर खर्चे बंधे होते हैं। हमें बजट बना कर तय करना होता है- कहाँ कटौती करके किस आवश्यकता को पूरा किया जाय ! जरूरी खर्चे तो रुकेंगे नही, भले कर्ज ही लिया जाय!" "लक्ष्मी के बापू, कल सेठजी का बेटा 50 हजार का मोबाइल लाया, बोला-जीजी के पास जाऊंगा, नया मोबाइल चाहिए। सेठानी जी ने अपने लिये, बेटी के लिए , उसके बच्चों के लिए महंगे कपड़े और कीमत...