देवीलाल को अपने मकान के लॉन में बैठना बहुत पसंद है । सड़क पर आते जाते लोग दिखते रहते हैं। परिचितों से राम-रामी हो जाया करती है। यहीं से मकान के ऊपरी हिस्से में रह रहे किरायेदार की बच्ची की चुहलबाजी कानों में पड़ती रहती है। पांच वर्षों से सचिन और सारिका किरायेदार के रूप में रह रहे हैं। दोनों सरल और सहायक स्वभाव के युवा दंपत्ति हैं , 3 वर्ष की बच्ची है। देवीलाल को इन्हें कभी किसी बात के लिए टोकना नहीं पड़ा। पिछले वर्ष पत्नी रुक्मणी का देहांत हुआ , तब से देवीलाल बहुत अकेले पड़ गए। इन दोनों ने ही संभाला। बेटा राजेश और बहू तो दो ही दिन रुके। पत्नी का 50 वर्ष का साथ छूटा, देवीलाल के लिए एकाकी जीवन काटना दूभर हो गया था। आहत जीवन को सहारा देने के बजाय राजेश छोड़कर चला गया। भला हो सचिन सारिका का, 'बाबूजी-बाबूजी' कह-कह कर आस पास ही रहे, हमदर्द और सेवा से ओतप्रोत रहे। फोन की घंटी बजी। देवीलाल ने फोन उठाया, उस तरफ राजेश ही था- "पापा कैसे हो?" "ठीक हूँ।" "पापा, माँ के जाने के बाद इतने बड़े मकान में मन कैसे लगता होगा! क्यों न आप वहाँ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !