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Showing posts from May, 2017

छुट्टियों में ....

छुट्टियों में बच्चों का घर पर आना , है बड़ा सुखद जीवन बन नानी - नाना | सिद्धांत ,सुहानी ,गौरांश  और रिवान , देख इन्हें आती लबों पे मीठी मुस्कान | ह्रदय इनके हैं मासूम , कोमल सरीखे , दूर इनसे  द्वेष - दंभ के कांटे तीखे | हर चीज जानने को मन बड़ा हठीला , उत्सुकता प्रबल, है मन बड़ा बावला | आपके यहाँ इत्ती गर्मी क्यों ? सुबह ये मोर शोर मचाते क्यों ? नन्हीं चींटी दाना ले कर चढ़ती क्यों ? दीवार पर सौ बार फिसलती क्यों ? रोज -रोज नानू टॉफी दिलाते क्यों ? तो नानी , आप नाराज होती क्यों ? एक स्मार्ट फ़ोन हमारे पास हो तो , हमारी मम्मा को समझाओ तो | रोना मचलना है अधिकार इनका , मोती से आंसू है हथियार इनका | दृगों में कुतूहल है छलक रहा , मुख पर विजय - गर्व  झलक रहा | प्यारा - सा खेल - खिलौना बचपन , भागती दुनिया में सुकून - सा बचपन | ये रोम-रोम आल्हादित कर जाते , नाना-नानी को 'फुल रिचार्ज ' कर जाते |

कंगन

                                                       दो दिन बाद सावित्री और रोहित की इकलौती बेटी विभा की शादी है | शादी में रोहित के सभी अपने रिश्तेदार आए हैं , पर सावित्री का मन उदास है  | शादी में शामिल होने के लिए विदेश से भाई नीरज अकेला आया है , भाभी नीरा नहीं आई | पीहर के नाम पर एक भाई ही तो है | महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है , पर पीहर से आत्मीयता कभी कम नहीं होती | भाई - भाभी दोनों ही शादी में शामिल होते तो रौनक बढ़ जाती | वैसे भी विभा अकेली बेटी , बाद में कौनसा मौका आएगा , जिसमें वे बहन के घर विदेश से आयेंगे ! अचानक विभा की आवाज से सावित्री का ध्यान भंग हुआ - ' रमेश मामा आ गए , मामी आ गई | ' नीरज का दोस्त रमेश , जिसने सावित्री को हमेशा बड़ी बहन का मान दिया | सावित्री भी रमेश और रमा के व्यवहार से सदा खुश रही | दोनों को देखते ही सावित्री के चेहरे पर चमक आ गई | लगा - रिश्ते खून के ही नहीं...

बहती गंगा

                           अचानक निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी पहुँच गए | स्टोर कीपर को पुकारते हुए स्टोर में प्रवेश किया | रजिस्टर को हाथ में लेकर सभी सामनों की जाँच - पड़ताल हुई | स्टोर के बाहर दरवाजे के पास एक बड़ा तख़्त पड़ा हुआ था | उसकी एंट्री रजिस्टर में थी | अधिकारी ने पूछा - " इसे स्टोर के बाहर क्यों रखा है ? " स्टोरकीपर - " सर , यह तख़्त बहुत बड़ा है , स्टोर के अन्दर नहीं जा पा रहा है , इसलिए बाहर रखा है | " अधिकारी - " तुम सही कह रहे हो , यह जरुरत से ज्यादा बड़ा है | तुम्हें अड़चन ही दे रहा है | ऐसा करो - यह मेरी कोठी भिजवा दो , वहां से छोटा तख्ता ले आना | कुछ ही देर में रजिस्टर में लिखे ' तख़्त ' में 'आ ' की मात्रा लगा दी गयी और ' तख्ता ' लिखा गया |                              दो दिन की छुट्टी बिताने के बाद बड़े बाबू दफ्तर पहुंचे | स्टोर के दरवाजे के पास रखा तख़्त कुछ छोटा लगा | स्टोरकीपर से जानकारी ली | पूरा किस्सा ही जान गए | बड़े बाब...