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Showing posts from January, 2018

खुले पंख

अब खुल गए हैं पंख मेरे , अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें | चाहतों की उड़ान भरता बावला मन , धुंध के परे खुला आसमान | जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत , उल्हानें नहीं करते अब आहत| चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला , क्यों न आए चेहरे पर नूर भला | चाँदनी छा गई है बालों में , तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में | अहसासों और जज्बातों के रेले , खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले | कमी नहीं है भौतिक सुखों की , कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की | मोबाइल पर कुछ पल बात कर , खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर | 'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ , मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ | अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ , पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ | प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ , ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ | बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो , जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?

दान

जनवरी महीना है , जोरों की मावठ पड़ रही है | बर्फीली हवा सुई सी चुभ रही है | दोपहर की धूप में बैठना अच्छा ही लगता है | यूँ कहें - ११ बजे घर का सारा काम करके महिलाओं को धूप में बैठ कर गप्पें मारने का बड़ा इन्तजार रहता है | घर के बाहर कई खटिया पड़ी हैं | कोई पालक-मेथी संवारती , कोई मटर छीलती, तो कोई बुनाई करती | इन सब के बीच बैठ जाती काकी | आज भी एक - एक करके सभी अपने अपने घरों से आ गई | काकी तो धूप निकलते से ही बैठ गई | काकी के धोंक देकर सब अपने अपने काम ले कर बैठ गई | जमघट पूरा जम गया | काकी बोली -' बिनणीयों , इब के संक्रात पे तेरुंडा में के करोगा ? सावित्री , तू के चीज को दान करेगी ?" " काकी , पहल के साल तकिया का गिलाफ करी थी , अब के 14 चादरां करुँगी |" " सुमन , तू ? " " काकी, मैं पहल के साल 14 किलो गुड़ करी थी , इब के 14 नारियल करश्युं |" " चंपा , तू ?" " काकी , हाल तो सोची कोनी !" " रामारी , कद सोचेगी , दो दिन रहगा है संक्रात का | तने बेरो है संक्रात में...