अब खुल गए हैं पंख मेरे , अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें | चाहतों की उड़ान भरता बावला मन , धुंध के परे खुला आसमान | जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत , उल्हानें नहीं करते अब आहत| चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला , क्यों न आए चेहरे पर नूर भला | चाँदनी छा गई है बालों में , तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में | अहसासों और जज्बातों के रेले , खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले | कमी नहीं है भौतिक सुखों की , कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की | मोबाइल पर कुछ पल बात कर , खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर | 'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ , मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ | अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ , पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ | प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ , ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ | बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो , जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !