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Showing posts from 2017

नव वर्ष

वर्ष का आखिरी महीना है , काम का जोर कुछ ज्यादा ही रहा | नीरज हमेशा अपने काम के प्रति वफादार रहा |ऑफिस में अपने सहयोगियों के साथ व्यवहार भी मिलनसार ही रहा है |पर , आज जरा सी चूक से टेंडर पास नहीं हुआ | कंपनी को काफी नुकसान हो गया | काफी रात बीत चुकी है , पर नीरज की आँखों से नींद गायब ही है | कानों में बॉस के ताने गूंज रहे हैं -' नीरज , तुमसे एक काम ढंग से नहीं हो पाया | अब तुम्हें रिटायर हो जाना चाहिए | इस से तो बेहतर यही होता मैं यह जिम्मेदारी सुरेश को ही सौंप देता |' तानेबाजी ,कड़वे बोलों के द्वारा अवहेलना एवं नफ़रत जाहिर हो ही जाती है |नींद तो आ नहीं रही , नीरज कमरे में चहलकदमी करने लगा | शीशे के सामने खड़ा हो गया -' क्या मैं उम्रदराज हो गया ? सुरेश मुझसे जूनियर है , वह खुद मुझ से सुझाव लेता है |' घडी देखी -'अभी तीन ही बजे हैं | मेरी आवाज से नीना की आँख खुल जायेगी |' नीरज लेट गया | फिर आँख ऐसी लगी कि नौ बजे ही खुली | बिटिया कॉलेज जा चुकी | उठा, अखबार पर निगाह डाली,पर टिकी नहीं | नीना चाय- बिस्किट ले आई | दोनों ने साथ में चाय पी | नीना बोली -" आज मैं...

पदचाप

यह कैसी फैली दूर तक तन्हाई . निःशब्द खामोशी क्यों है छाई ? गहरे सन्नाटे से मैं हूँ डरती , पदचाप सुनने को बैचेन रहती | यह बहती पवन, पत्तों की सरसराहट , किसी प्रतीक्षा में चौकन्ना कर देती आहट | माँ, तेरे पदचापों को हूँ जान गई , तेरे आने से बालपनी सुख पा गई | मेरे कानों को दे देती दस्तक,तेरे मन की बात , क्या तेरे मेरे बीच है कोई अदृश्य तार ? अपने आँचल में है तूने मुझे छिपाया , तपती धूप में है तू प्यार की पावन माया | ये पतझड़ में बहार है कैसे आई ? मेरे बच्चे के आने की आहट दी सुनाई | जिंदगी में मैंने जानी मोह, ममता की माया , तेरे नटखट सवालों ने मुझे नया पाठ सिखाया | मनमोहक , निश्छल मीठी है तेरी पहचान , उदासी में आशा का संचार है तेरी मुस्कान | दरवाजे की चौखट पर तकती ये दो आँखें , 'उन' की आने की आहट देते ये हवा के झोंके | ए प्रिय , एक उम्मीद -तेरे पदचाप ले कर आती है | जज्बातों का अहसास दिला देती है | मनुहार , तकरार , परवाह ,सभी है इस बंधन में , एक सजीला-सा विश्वास, मानो कोई...

स्वार्थ

' सीमा , उठ बेटा , 6 बज गए | मैं जा रही हूँ | तेरे पापा के लिए काढ़ा बना दिया है | दवाई सिरहाने रखी है | खाना भी तैयार कर दिया है | दोपहर कम्प्यूटर क्लास में जाने से पहले भैया और पापा को खाना खिला देना | चल , गेट बंद कर ले | '- कहते - कहते इंदु घर से निकल गई | तड़के उठकर घर के सारे काम करना इंदु की आदत हो गयी है | रोज घर से निकलकर मंदिर जाती | भगवान् से प्रार्थना करती - ' बड़ी बहूजी का स्वास्थ्य सदा इसी तरह बना रहे ,उनकी उम्र लम्बी हो ताकि उनकी सेवा से मेरा परिवार पलता रहे |' दो वर्ष पूर्व सेठ जी का देहान्त हो गया था | देहांत से पूर्व सेठजी सारी संपत्ति अपनी पत्नी अर्थात् बड़ी बहूजी के नाम कर गए | साल भर से बड़ी बहूजी अस्वस्थ ही हैं | दो बेटों का परिवार है , लम्बा चौड़ा व्यवसाय है , बड़ी कोठी है | बड़ी बहूजी का कमरा भी सुविधा संपन्न है | वसीयत के अनुसार जब तक वे जिन्दा हैं , मालिकाना हक उन्ही का रहेगा | घर में सभी में प्रेम है , पर बड़े घर में दूर - दूर कमरों में बनी निजता से निहित प्रेम कम ही उजागर हो पाता है | साल भर से इंदु सुबह सात बजे बड़ी बहूजी की सेवा म...

व्हाट्सअप

                                               व्हाट्सअप में हम सहेलियों का ग्रुप बड़ा सक्रिय और मनोरंजक हो गया है | राजश्री के चुटकुले पढ़ते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है , तो माधवी कवीयों के चुने हुए पद्द्यांश ही व्हाट्सअप कर देती है , जिन्हें मैं शेयर करे बिना नहीं रह पाती हूँ | सुनीता को राजनीति के हास्यास्पद कार्टून या छीटाकशी के वाकये ही पसंद है | सुनिधि के व्हाट्सअप तो दिल को छू देते हैं | रिश्तों की अहमियत , रिश्तों में मिठास , माता पिता के प्रति सम्मान के उसके मैसेज बहुत अच्छे लगते हैं | आज के भागदौड़ की जिन्दगी में रिश्तों को इतना महत्त्व कौन दे पाता है ! सुलझी सोच , संवरा व्यक्तित्व और प्रबुद्ध दृष्टिकोण यही काफी है - अपना प्रभाव छोड़ने के लिए | एक तरह से कहा जाए व्हाट्सअप के बीच समय अच्छा बीत जाता है और समीपता बनी रहती है | जब 3-4 सहेलियाँ ऑनलाइन हों तो रोचक वार्ता भी छिड जाती है | मुट्ठी बंद अंगूठा ऊँचा दिखा कर - पसंद होने का आभास कराना , तरह -तरह के चेहरे दि...

सपना - अपना (भाग 2)

कमाया हुआ धन , परिवार की माया , हरे भरे बाग़ , माता पिता की छाया |             - अब बन गया एक सपना | अब छोड़ो , हुई यह बात पुरानी , इसमें है न कोई दम , यह मैंने जानी | अब आया , ' हाय - हैलो ' का ज़माना , कह दो भैय्या , इसे मॉडर्न ज़माना |              - इसे ही कहो अपना | एकल परिवार , व्यस्त माता - पिता , अब रहा न कोई राम , न कोई सीता | दंगा - फसाद , ये रोज के लफड़े , बढ़ते सपने , घटते कपडे |             - इसे ही कहो अपना | इन्टरनेट से बन गयी दुनिया छोटी, खा बर्गर पिज़्ज़ा , भूले रोटी | दो दो मोबाइल सदा रहे साथ ,  ले गर्लफ्रेंड के हाथों में हाथ |             - इसे ही कहो अपना | मानो मेरी बात ,सपने देखना छोड़ो , यथार्थ में जियो , ख़्वाबों को तोड़ो | हम आप बन जाए कर्णधार , क्यों रहे देश बीच मझदार ?            - इसे ही कहो अपना | शिक्षा , संस्कार , प्यार के खोल दो खाते , विरासत में न होंगे खजाने रीते | युवा पीढ़ी को द...

' सपना - अपना '

नारी की साड़ी , माँ का आँचल , दुल्हन का परदा  , वो प्रेम के बोल | माचिस की तिल्ली , मिट्टी का चूल्हा , एक टेलीफोन से जुड़ा पूरा मुहल्ला |                    - अब बन गया एक सपना | सीमित सपने , संयुक्त परिवार , लहराती चोटी , दादी का प्यार | बाजरे की रोटी , गुड़ की मिठास , कलम -दवात और चिट्ठी की आस |                      - अब बन गया एक सपना | वो देश प्रेम , इंसानों में राम , निरोगी काया , बेरोजगारों को काम | अनाज के ढेर , सर्कस और मेला , आदर - सत्कार , गुरु और चेला |                        - अब बन गया एक सपना | मनुष्य की आयु , आकाश में उड़ते पंछी , पड़ोसी अंकल की डांट भी लगती अच्छी | गुल्ली - डंडा , खेल का मैदान , चुस्त - दुरुस्त , खिला - खिला मन |                       - अब बन गया एक सपना | सिलबट्टे की चटनी ,तीखा अचार | रिवाजों का बंधन , धोंक नमस्...

वो बुढ़िया

                                 आज स्कूल जाते वक्त दोनों बच्चे एलान कर गए थे - ' पापा ऑफिस से जल्दी आ जाना , डिनर बाहर करेंगे । ' काफी दिनों से साथ में बाहर घूमने भी नहीं गए थे । घड़ी की सुइयों के साथ बंधी दिनचर्या से कुछ नीरसता - सी आ गयी है । शाम के छह बज गए हैं । घर जल्दी पहुंचना है , आज बस की कतार में नहीं लगूंगा । मैंने टैक्सी रोकी और बैठ गया । सोचने लगा- '  रोज 20 रुपये लगाकर एक घंटे में घर पहुँचता था , आज 150 रुपये खर्च कर रहा हूँ । जल्दी पहुँच भी तो जाऊँगा । ' लाल बत्ती पर टैक्सी रुकी , मोगरे की वेणियाँ हाथ में लिए एक लड़की टैक्सी की खिड़की के पास खड़ी हो गयी । याद हो आया - पहले मैं श्यामा के लिए कई बार वेणी ले जाया करता था , पर अब बातें भूली बिसरी-सी हो गई । मैंने उस लड़की को ३० रुपये दिए और एक वेणी ले ली ।                                   घर पहुंचा - बच्चे तैयार ही थे और श्यामा भी । गजरा देख कर श्यामा मुस्...

एक लघु कथा -सूत्र

आज तो हद ही होगी - स्कूल की बस घर के सामने खड़ी है , ड्राइवर हॉर्न दे रहा है और आर्यन अपने दोस्त से मोबाइल पर बात ही कर रहा है । मैंने मोबाइल हाथ से छीना , तब भागा । सुबह से आर्यन के इस व्यवहार से मेरा मन खिन्न है , इसकी दोस्तों से इतनी क्या बातें होती हैं ! रोज स्कूल में  मिलते ही हैं ! सारे दिन मोबाइल पर घंटों बाते करता रहता है - पढ़ाई का हर्जा और अतिरिक्त खर्चा । इसे वित्तीय स्वतंत्रता क्या दी गयी , यह फ़ायदा ही उठा रहा है । महीने के अंत में 2500-3००० रुपयों का बिल - एक आम बात हो गयी है | फटकारो , तो गुस्से में बड़बड़ाने लगता है । बड़ों के लिए अजब सी दुविधा है कि आज के सुविधा संपन्न और स्वछंद परिवेश में परवरिश की दिशा क्या हो ? बच्चों में चिड़चिड़ापन ,आक्रामक व्यवहार और जल्दी गुस्सा आना एक आम समस्या हो गई है । शुक्र है - स्कूल में मोबाइल ले जाने कि इजाजत नहीं है । श्रीमान जी तो चाय पीते पीते अखबार पढ़ने में व्यस्त हैं , पर मेरा टेंशन बढ़ता ही जा रहा है । इन्होने अखबार समेटते हुए कहा - " मौसम बहुत अच्छा है , बारिश हो कर चुकी है । चलो ,थोड़ा घूम आते हैं । हरियाली का लुत्फ़ उठाया जाय । ...

अप्रत्यक्ष सेवा

                             राजश्री महीने के आखिरी शनिवार -रविवार घर की साफ - सफाई करती है । आज ननद - भौजाई सफाई - अभियान में जुटी हुई हैं । संगीता ने अपनी किताबों की अलमारी , कपड़ों की अलमारी , कमरे की सफाई की । राजश्री ने रसोई की सफाई की । प्रायः रसोई में टूटे -फूटे प्लास्टिक के , लोहे के डब्बे निकल ही जाया करते हैं । राजश्री को कबाड़ सहेज कर रखना पसंद नहीं । सफाई हो तो पूरी हो ! वैसे भी उसने कहीं पढ़ा था - ' घर में कबाड़ इकट्ठा करने से नकारात्मक भावनाएं भी इकट्ठी होने लगती हैं । ' उसने उन डब्बों को भी कूड़े की बाल्टी में डाल दिया ।                                राजश्री ने संगीता को आवाज दी - " सारी सफाई हो जाए तो नुक्कड़ पर रखे बड़े डब्बे में यह बाल्टी पलट आना । "                  ...

धरती करे पुकार

अपने ही देश में  फैला कैसा यह आतंक , अपने ही अपनों से हैं, भयभीत - राजा हो या रंक। दूध ,फल , तरकारी , सब हैं मिलावट से तराबोर , साँसें हुई सस्ती ,यह कैसा कारोबार ? रिसते जख्म , पीकर मिलावट का जहर , नासूर बन पड़ रहा स्वास्थ्य पर कहर । लूट - खसोट , साजिशों का तूफान , बढ़ता  भ्रष्टाचार , ढा रहा आम जनता पर हो घोर अत्याचार । कौड़ियों के मोल हुए , जान ईमान इंसान के , बढ़ रही रंजिश , दुश्मन हुआ भाई - भाई के । बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ - जुमला सुना सदा , हो रही अस्मिता की हत्या , है हर कोई गमजदा । भूखे गिद्ध के मानिंद , कुचल रहे नारी सम्मान , भीतर है खौफ , गली - गली में हो रहा मान - मर्दन । वैज्ञानिक युग में सफर हुआ , क्यों अनिश्चित , असुरक्षित , लापरवाही की इंतिहा , जिंदगियां हुई उपेक्षित । राम नाम का जाप करो , जीवन छुक-छुक रेल भरोसे , बेपटरी होती ट्रेनें , दहकते दर्द ,अहकती  साँसें । मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से, बन बैठे योगी , चल चरित्र से है ये लम्पट , योगी नहीं , हैं भोगी । पाखंडी बाबाओं के दोगलेपन से ,श्रृद्धा पर पड़ रही मार , 'विश्वास ' से  हो...

तीर्थयात्रा

                                    सारी तैयारी हो चुकी है | सुनील और रवीना कल यात्रा के लिए रवाना हो जायेंगे | इनके हमउम्रों का ग्रुप चारों धाम की तीर्थ यात्रा सुनियोजित कर चुका है | मौक़ा अच्छा है - ये दोनों भी शामिल हो रहे हैं | हर वर्ष कुछ दिनों के लिए अपने गाँव के पुश्तैनी घर रह आते थे | माँ और पिताजी वहीँ रहते हैं | गाँव में पड़ोस के परिवार काफी मिलनसार और सहयोगी हैं - सो उन दोनों को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है | इस बार रवीना ने तय कर ही लिया था कि गाँव नहीं  जायेंगे , छुट्टियाँ कहीं और बिताएंगे |                                      रात में सुनील सूटकेस बंद कर ही रहा था , उसके मोबाइल पर घंटी बजी | दूसरी तरफ सुनील के पिता ही थे- " बेटे सुनील , तुम्हारी माँ की तबियत अचानक बिगड़ गई है | मैं अस्पताल ले कर आ गया हूँ | तुम दोनों भी तुरंत आ जाओ | " " पर पिताजी , हमारी तो तीरथ की टिकटें करी हुई ह...

स्मृतियाँ

स्मृतियाँ की मंजूषा में हैं मोती  अनगिनत, मोती टूटे नहीं , छूटे नहीं | अम्मा के मुकलावे का वो पीढा , बाबा की चांदी के मूठ वाली छड़ी | माँ के हाथ की जाकेट , पिताजी का प्यार भरा आशीष | मजबूत शख्सियतों की बोलती निशानियाँ हैं , नहीं खोना चाहती उनके होने का आभास | आज भी यादों में कैद हैं हर लहमे , वे सिर पर हाथ रखते तो लगता , आसमान ने साया कर दिया | बिखरती सदा दुआओं की महक , साथ छूट गए , यादों के हिस्से बन गए | मैंने क्या हासिल किया ? दिन रात क्या बटोरती रही ? -जो विरासत छोड़ जाऊँगी !

एक भरोसा

                                          बुआ से लगाव मुझे सदा रहा | या यूँ कहो - बुआ के लिए मैं भी प्रिय भतीजा रहा | जिंदगी में उन रिश्तों की उम्र लम्बी नहीं होती , जो एकतरफा होते  हैं | बुआ की आत्मिक वात्सल्यता और मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान में कभी कमी नहीं आई | बस , मेरे दिल में एक टीस से आत्मग्लानि बनी हुई है | पता नहीं - उनसे एक झूठ बोलकर मैंने सही किया या गलत !                                           पिछले वर्ष उनकी तबियत काफी नरम हो गई थी , उन्हें अस्पताल में भर्ती करा गया | उनके शरीर को अतिरिक्त खून की सख्त जरुरत थी | घर के सभी स्वस्थ सदस्यों के खून की जाँच हुई, पर किसी से उनका खून मेल नहीं खाया | उस समय मैंने भी अपने खून की जाँच कराई | अन्ततः बुआ को किसी अनजान ब्लड - डोनर के द्वारा ही खून दिया गया | खून तो शरीर में बहता है , वह व्यक्ति कौन है ? किस जाति का है...

आधार का आभार

                                            रामदीन एक खेतिहर मजदूर- दूसरों के खेत में मजदूरी करना ही इसका कमाई का साधन रहा | परिवार में बूढी मां , पत्नी और तीन बच्चे हैं | इस वर्ष तो अकाल से खेत तो सूखे ही , घर में भी खाने के लाले पड़ गए , तिस पर बीमार मां | चार दिन से चूल्हा नहीं जला , आज तो अनाज की व्यवस्था करनी होगी | यह पीतल का मटका किस काम का ? पत्नी को बता कर वह मटका बाजार ले गया और उसे बेचने पर  २०० रुपये उसके हाथ में आये | तभी उसने देखा - एक जीप पर सवार एक व्यक्ति माइक से घोषणा कर रहा था - ' सरकार इस गाँव में पक्की सड़क बनाना चाहती है , जिसके लिए मजदूरों की जरुरत होगी , जो भी काम करना चाहता हो , अपना नाम यहाँ की पंचायत में लिखा दे | ' रामदीन ने सोचा - ' इस काम में देर क्यों करूँ ' तुरंत पंचायत में पहुंच कर मजदूरों में अपना नाम लिखा दिया | अगले दिन से अपनी हाजिरी लिखाकर अन्य मजदूरों के साथ सड़क खुदाई में जुट गया |               ...

दो पल ....फुरसत के

कुछ बीते लम्हें यादों में ठहरे हैं , उनीदीं आँखों में ख्वाब सुनहरे हैं | समय के साथ भागमभाग कर रहे हम , चल न सके कभी फुरसत के चार कदम |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || कुछ मुरीदों के ढेर , कुछ मुनिदों के धागे , जुड़ता रहा नया सफा जिन्दगी के आगे | पलटते रहे कलेंडर के पन्ने ,गुजरते रहे दिन , साल | अपना चेहरा देख आईना भी पूछ रहा सवाल |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || उबरना चाहती हूँ अनचाही लम्हों की चुभन से , जागना नहीं चाहती , उस तिलस्मी ख्वाबों से | सुबह आने से पहले रात गुजर जायेगी , नजारों की ये हंसीं मुलाक़ात गुजर जाएगी |                          आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || रोज उसी मंजिल जाना है और आना है , फिर इन क़दमों में इतनी हड़बड़ी क्यों है ? जिंदगी के हसीन यादों के दरख्त बढ़ने दें , चुभती यादों की खरपतवार उखाड़ दें | ...

मॉर्निंग वाक

                                                    उम्र की झलक चेहरे पर , तन पर दिखने लगी , शिथिलता और थकान महसूस होने लगी , तो स्वास्थ्य के प्रति जागृत होने की भावना भी जाग उठी | लो जी , हमने प्रातः-सैर शुरु कर दी | हाँ , सही फरमाया - ' मोर्निंग वाक '| घर पास ही बहुत बड़ा पार्क है | प्रातःकाल-सैर के लिए उचित जगह है | सूरज की बाट जोहती पहली किरण से भी पूर्व सैर के लिए निकल जाती हूँ |                                                       यह पार्क सुनियोजित तरीके से बड़े वृक्षों , छोटे पौधों से सुसज्जित है | इस समय गुलमोहर की बहार है और नीम के वृक्ष नव पत्तों और निम्बोली से आच्छादित हैं | इन वृक्षों को देख कर लगता है - कुदरत की नेकियों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है | जड़ें जितनी गहरी होती हैं , पेड़ का फैलाव भी उतना ही ज्यादा होगा ...

छुट्टियों में ....

छुट्टियों में बच्चों का घर पर आना , है बड़ा सुखद जीवन बन नानी - नाना | सिद्धांत ,सुहानी ,गौरांश  और रिवान , देख इन्हें आती लबों पे मीठी मुस्कान | ह्रदय इनके हैं मासूम , कोमल सरीखे , दूर इनसे  द्वेष - दंभ के कांटे तीखे | हर चीज जानने को मन बड़ा हठीला , उत्सुकता प्रबल, है मन बड़ा बावला | आपके यहाँ इत्ती गर्मी क्यों ? सुबह ये मोर शोर मचाते क्यों ? नन्हीं चींटी दाना ले कर चढ़ती क्यों ? दीवार पर सौ बार फिसलती क्यों ? रोज -रोज नानू टॉफी दिलाते क्यों ? तो नानी , आप नाराज होती क्यों ? एक स्मार्ट फ़ोन हमारे पास हो तो , हमारी मम्मा को समझाओ तो | रोना मचलना है अधिकार इनका , मोती से आंसू है हथियार इनका | दृगों में कुतूहल है छलक रहा , मुख पर विजय - गर्व  झलक रहा | प्यारा - सा खेल - खिलौना बचपन , भागती दुनिया में सुकून - सा बचपन | ये रोम-रोम आल्हादित कर जाते , नाना-नानी को 'फुल रिचार्ज ' कर जाते |

कंगन

                                                       दो दिन बाद सावित्री और रोहित की इकलौती बेटी विभा की शादी है | शादी में रोहित के सभी अपने रिश्तेदार आए हैं , पर सावित्री का मन उदास है  | शादी में शामिल होने के लिए विदेश से भाई नीरज अकेला आया है , भाभी नीरा नहीं आई | पीहर के नाम पर एक भाई ही तो है | महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है , पर पीहर से आत्मीयता कभी कम नहीं होती | भाई - भाभी दोनों ही शादी में शामिल होते तो रौनक बढ़ जाती | वैसे भी विभा अकेली बेटी , बाद में कौनसा मौका आएगा , जिसमें वे बहन के घर विदेश से आयेंगे ! अचानक विभा की आवाज से सावित्री का ध्यान भंग हुआ - ' रमेश मामा आ गए , मामी आ गई | ' नीरज का दोस्त रमेश , जिसने सावित्री को हमेशा बड़ी बहन का मान दिया | सावित्री भी रमेश और रमा के व्यवहार से सदा खुश रही | दोनों को देखते ही सावित्री के चेहरे पर चमक आ गई | लगा - रिश्ते खून के ही नहीं...

बहती गंगा

                           अचानक निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी पहुँच गए | स्टोर कीपर को पुकारते हुए स्टोर में प्रवेश किया | रजिस्टर को हाथ में लेकर सभी सामनों की जाँच - पड़ताल हुई | स्टोर के बाहर दरवाजे के पास एक बड़ा तख़्त पड़ा हुआ था | उसकी एंट्री रजिस्टर में थी | अधिकारी ने पूछा - " इसे स्टोर के बाहर क्यों रखा है ? " स्टोरकीपर - " सर , यह तख़्त बहुत बड़ा है , स्टोर के अन्दर नहीं जा पा रहा है , इसलिए बाहर रखा है | " अधिकारी - " तुम सही कह रहे हो , यह जरुरत से ज्यादा बड़ा है | तुम्हें अड़चन ही दे रहा है | ऐसा करो - यह मेरी कोठी भिजवा दो , वहां से छोटा तख्ता ले आना | कुछ ही देर में रजिस्टर में लिखे ' तख़्त ' में 'आ ' की मात्रा लगा दी गयी और ' तख्ता ' लिखा गया |                              दो दिन की छुट्टी बिताने के बाद बड़े बाबू दफ्तर पहुंचे | स्टोर के दरवाजे के पास रखा तख़्त कुछ छोटा लगा | स्टोरकीपर से जानकारी ली | पूरा किस्सा ही जान गए | बड़े बाब...

बरस रही है ज्वाला भारी

बरस रही है ज्वाला भारी , तप रही है धरती सारी | उगल रहा है रवि - अनल , चाँद भी नहीं रहा शीतल | स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप , अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप | असहनीय और तड़पाती ये पछवा  , धूल  धूसरित लू और ये शुष्क हवा | शत-शत नमन है हलधर को , सह जाते धूप के इस कहर को | फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे , ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे | वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान , गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार | प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं , ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |

मुआवजा

                रामदीन अपनी पोटली लेकर बस में चढ़ गया | बस में चदते ही पोटली कुलमुलाई , कुछ हलचल हुई | कंडक्टर चिल्ला पड़ा - " क्या है बे इसमें ? " रामदीन - " इसमें एक छोटी सी बत्तख है | कंडक्टर - " चल टिकट ले  , दो टिकट के पैसे निकाल | रामदीन - " हुजूर , यह पोटली तो मेरी गोद में रहेगी | लोग तो बड़े-बड़े सामन ले कर चढ़े हैं | कंडक्टर - " पर इस बत्तख में प्राण हैं , तो मुसाफिर हुई ना ! "                  आखिर रामदीन को दो टिकिट के पैसे देने ही पड़े | बस शहर से बाहर निकली ही थी , ड्राईवर का मोबाइल बोल पड़ा | मोबाइल  पर बात करने में बस का नियंत्रण बिगड़ गया और समान से लदे एक ट्रक से टकरा गई | एक बहुत बड़ा हादसा हो गया | कई मुसाफि मर गए और कई घायल हो गए | रामदीन के भी काफी चोटें आई |                     रोडवेज ने सभी मृतकों के आश्रितों को 50 -50 हजार रुपये और घायलों को 5-5 हजार रुपये मुआवजे के तौर पर देने की घोषणा कर दी | रामदीन भी रोडवेज से मुआवजे क...

आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में

उदासी में जब कोई नहीं होता साथ , विश्वास है-वो तो सदा रहता है साथ | विश्वास का नहीं होता कोई आकार , इसलिए ' वो ' भगवान है निराकार हर पल, हर घड़ी में इबादत की , प्रार्थी बन मंदिरों में घंटनाद किए | इस आस्था ने मुझे आस्तिक बना दिया , हर हालात में उस पर निर्भर बना दिया | राह पर चलते , जब मंज़र बदल जाते हैं , उम्मीद टूटने पर विचार ही बदल जाते हैं | जीवन के झंझावात में मैं चूर हो गई , उसके अहसास की आस्था ही टूट गई | व्यर्थ है विश्वास, उस झूठी आशा पर , व्यर्थ है विश्वास , उस मुग़ालता पर | एक पल ही में मैं नास्तिक बन गई , जो हासिल था उसे ही क़बूल कर गई | आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर से, उबर गई मैं अब इस उलझन से | दर्द का अहसास हो या सुख की चाह , ईश की मौजूदगी दिखाती सदा राह | उसके होने में ही है स्वयं पर विश्वास , मेहनत से ही बढ़ रही पूरी आस |

सब्जी वाला

राजू की उम्र 18-19 वर्ष होगी | ठेले पर फल - सब्जी बेचना -इसका रोजगार है | प्रायः मेरे आवास के आगे से निकला ही करता है | एक दिन वह घर के आगे से निकल रहा था तो मैंने उसे रोका और फलों के दाम जानने लगी | उसे दाम बताने में बहुत परेशानी हो रही थी | ऊपर की ओर मुँह करके दाम बताने लगा - मानों कोई पोपला बोल रहा हो | उसका मुँह तम्बाकू - जर्दे से भरा हुआ था | प्रायः देखा है - तम्बाकू- जर्दा खाने वालों को बोलने में परेशानी होती ही है , उनसे बात करने वाले भी असहज ही रहते हैं | राजू से दो मिनट बात करने में ही जर्दे की महक से मुझे परेशानी होने लगी | मैंने कहा -" राजू, तू हमें इतने बढ़िया फल खिला रहा है और तूने अपने मुँह में जहर भर रखा है | कभी सोचा है - तम्बाकू की आदत से भविष्य में तुझे क्या-क्या परेशानी होगी  ?" राजू -" मुँह में कुछ डला रहे तो सुस्ती नहीं आती | " मैंने उसे समझाया -" सुस्ती भगाने के तो कई उपाय हैं , मुँह में टॉफी डाल लो , इलायची या सौंफ डाल लो | तम्बाकू से ज्यादा खर्चीली तो नहीं , शरीर भी बुरे परिणाम से बचा रहेगा | " बहुत प्यार से राजू को समझाया ,  इस ...

कर्म प्रधान विश्व करि रखा

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , युग तो है कर्म का - यह सीखा | लकीरों की किस्मत पर विश्वास कहाँ ? मेहनत से लकीरों को बदल दे , विश्वास यहाँ ! चाहत से फूल झोली में नहीं गिरते , हाथों से डाली को हैं हम हिलाते | आँखें मूंद नहीं सकते भाग्य - भरोसे , तकदीर भी तो है तदबीर के भरोसे | सिंह भी सोते हुए निवाला नहीं पाता , किनारे बैठ मछुआरा मछली नहीं पाता | मांझी ने पहाड़ को काट रास्ता बनाया , तदबीर से नामुमकिन को मुमकिन बनाया | तकदीर से रार क्यों ठानी जाय ? अँधेरे से हार क्यों मानी जाय ? अपने हिस्से का दीया तो जलाना होगा , नाराज तकदीर को तदबीर से मनाना होगा |

तरेड़

                                      दुलारचंद ने कुलाह सिर पर जमाया , शीशे के सामने खड़ा पगड़ी बाँधने लगा | शीशे पर ध्यान गया - अरे , शीशे पर तो तरेड़ आ गई है | घर में खंडित शीशा रखना तो शुभ नहीं | वैसे भी घर में कुछ भी तो शुभ नहीं हो रहा | आज हाट बाजार  जा रहा है - दूसरा शीशा ले ही आएगा | आज पहली बार हाट जाने का उत्साह नहीं है |                                       गत वर्ष छोटे भाई नेमचंद का विवाह हुआ | दोनों भाईयों का परिवार बड़े प्रेम से रह रहा था | व्यापार में घाटा हुआ | दोनों पत्नियों के रहन -सहन की स्पर्धा ने घर में दीवार खड़ी कर दी | बंटवारा हो गया | पुश्तैनी मकान , पुश्तैनी व्यापार के दो हिस्से हो गए | आपस में बोलचाल बंद हो गई | बंटवारे में दुलारचंद ने कार ली और नेमचंद ने गाय -| दुलारचंद ने खिड़की से देखा - नेमचंद गाय दुह रहा है | दुलारचंद की पांच वर्षीया बेटी लाजो भागी आई | एक बड़ा खाली गि...

नारी शक्ति

                            दो दिन पूर्व हमने ' महिला दिवस ' मना कर हर वर्ष की तरह लकीर खींच ली या यूँ कहे हर वर्ष की तरह ' पर्व - अदायगी ' की | महिलाओं के गुणगान हुए , देश ने महिलाओं पर कई अहसान किए | सोचना होगा - ' क्या ऐसे दिवस की हमें जरुरत है ? '                              कुदरत और संस्कृति ने स्त्री को सृष्टि , समाज और संस्कार - निर्माण का विशेष दायित्व दिया है | इस दायित्व को निभाने के लिए स्त्री का दैहिक ही नहीं , मानसिक रूप से भी सक्षम होना जरुरी है | यह तो सच है कि एक स्त्री कई पीढ़ियों को शिक्षित कर लेती है |                               'बेटी बचाओ - बेटी पढाओ ' नारे को कितनी महिलाएं समझ पा रही हैं ! आज भी बेटी पैदा होने पर महिला घबरा जाती है | कन्या - जन्म पर घर का माहौल ग़मगीन हो जाता है | जब वह वजूद को बचाने में सक्षम नहीं हो पाती है , तो स्त्री - नस्ल ...

थामे हैं हाथ

आज ही की पावन बेला में थामे थे हाथ , सुख -दुःख में मिलकर चले साथ-साथ | प्रेम और विश्वास है भरपूर कमाया , जन्नत - सा घर मिल कर बनाया | खुश हैं जिन्दगी में जो कुछ मिला , जो न मिला , ना है इसका गिला | जीवन में रिश्तों का भण्डार मिला , कुहासे के बीच आशाओं का अम्बार मिला | बुजुर्गों के आशीष की सम्पदा मिली , बच्चों का प्यार , सहयोग अपार मिला | रिश्तों में रिश्ते यूँ ही फलते  रहे , हम पीढ़ियों - बीच सेतु बने रहें | रुठते-मनाते हम यूँ ही चलते जाएँ , बन संबल एक दूजे का साथ निभाए |

याचना

                                       दाताराम को दोस्त नंदराम के बीमार  होने की खबर मिली , वह उनके हालचाल लेने के लिए उसके घर की ओर मुड़ गया | रास्ते भर वह सोचता रहा कि नंदराम तो बहुत हृष्ट -पुष्ट और खुश मिजाज इंसान है , फिर बीमार कैसे हो गया | नंदराम के घर पहुँचने पर देखा - उसके सिरहाने काफी दवाइयां रखी हैं | दाताराम बहुत सहम गया | अनुमान लगाया -' काफी खर्चा हुआ होगा !' नंदराम ने बताया - " मैं अचानक मूर्छित हो गया | पूरे शरीर की जाँच हुई | डॉक्टर ने बताया - मस्तिष्क में खून का थक्का जम गया है | " दाताराम मन ही मन बुदबुदाने लगा - ' एक  बिमारी का इतना खर्चा ? '                                        दाताराम के पास जरुरत से ज्यादा धन है , परन्तु धन-लोलुपता अब भी बरकरार है | कंजूसी उसके स्वभाव में है | ' मोटा खाओ - मोटा पहनो ' का सिद्धांत दाताराम ने अपने जीवन में ही नहीं , पूरे घर ...

पब की दुनिया

                                          कई वर्षों से अमेरिका में रह रहे सुरेखा और सुजीत सभी सुख - साधनों - सम्पदा से तराबोर हैं | फिर भी  समृद्ध जीवन के बीच कहीं एकाकीपन तो है ही , रिश्ते - नाते , सम्बन्धी अपने सभी भारत में हैं , सो दूर हो गए | एक बेटी है -उर्वशी | एक दिन सुजीत के मन में विचार आया - ' किसी कारणवश हमें भारत लौटना पड़ा , तो उर्वशी कैसे एडजस्ट हो पाएगी ? ' यही सोचते हुए उर्वशी की स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद कॉलेज के लिए भारत में ही पढ़ाना उचित समझा | दिल्ली के नामी कॉलेज में नाम लिखा कर , रहने की व्यवस्था सुचारू रूप से करके दोनों अमेरिका लौट गए | फ़ोन , व्हाट्स अप और मेल द्वारा उर्वशी से संपर्क बनाए रखा |                                             लगभग छः माह बाद सुरेखा को बेटी को देखने की लालसा हुई और उर्वशी को बताए बिना भारत आ गई , उसके रूम पहुँच गई ...

लो , आ गया मधुमास

बीती वे लम्बी काली रातें ,         लो आ गया मधुमास | देखो , इन्द्रधनुषी हुआ ,         कुदरत का कैनवास | नवकोपलों से सजे ,         द्रुम डालियों के दल | अमवा भी बोराई,        बूढ़े वट पर चढ़ा यौवन बल | लम्बी ख़ामोशी के बाद ,        सुनी पक्षियों की चहचहाहट | ठिठुरन का हुआ अंत ,         आई गर्मियों की चुनचुनाहट | छितराए बादलों के बीच ,         चली ठंडी बयार | प्रफुल्ल है आमजन ,         ख़ुशी बढ़ाते आए त्यौहार | प्रभु की ही इनायत है ,         चहुँ ओर छा गया वसंत | हम रहे सदा हँस-मिल-जुल ,         जीवन में भी सदा रहे वसंत |

पाप या पुण्य

                                                          भगवती चरण वर्मा की कहानी ' प्रायश्चित ' हम सभी ने पढ़ी है |  लाला घासीराम की पतोहू , रामू की बहू के हाथों कबरी बिल्ली की हत्या - ब्रह्म मुहूर्त में हत्या अर्थात् घोर पाप | पंडित परमसुख का कहा जाना - ' यह तो नरक का विधान है ' - घर के सभी सदस्यों को मानसिक तनाव में डाल देता है | अगला जन्म नारकीय न हो , पंडित जी इसका मार्ग भी निकाल लेते हैं - ग्यारह तोले की सोने की बिल्ली और मनो अनाज का दान , साथ ही ब्राह्मणों का भोज | पूरी योजना कागज़ पर उतारी गई , इस बीच पता चला - बिल्ली उठ कर भाग गई |                                                             आज ऐसी ही स्थिति मेरे एक परिचित के पड़ोसी की है | इन्हें किसी पंडित या भविष्यवक्ता द्वारा सुझा...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

सीख

                                             दीनदयाल की दिनचर्या बड़ी शिथिल हो गई है | रिटायरमेंट में करने को कुछ नहीं | जब - तब खिड़की के पास कुर्सी डाल कर बैठ जाते हैं | सामने आम के पेड़ पर इनकी निगाहें टिकी हुई है | कई दिनों से देख रहे हैं - एक चिड़िया घोंसला बनाने में जुटी है | तीन डालों के संगम पर कुछ तिनके टिकाकर उस पर घोंसला बनाना - अनोखी कारीगरी ही है | एक - एक तिनका चुनकर चोंच में दबाकर लाना - एक साधना से कम नहीं | वे देख रहे हैं - कई बार चिड़िया कुछ तिनकों को फेंकती भी जाती है , शायद नाप - तोल में कमी रह जाती होगी | कभी धागे , कभी कपड़े की बारीक चिंदी उठा लाई | घर बुनना और चुनना - सभी काम चोंच से ही कर रही है | यह घोंसला बनाने वाली चिड़िया और कोई नहीं -  एक होने वाली माँ है -जो अपने आने वाले बच्चे के लिए महल बना रही है | दीनदयाल सोच रहे हैं - यह खुद के लिए तो कभी घर नहीं बनाती | यह बसाहट सिर्फ बच्चों के लिए |                ...

ख़ुशी

                                                                      काफी दिनों बाद दोनों बच्चे हॉस्टल से घर आ रहे हैं | स्मिता बहुत खुश है | सुरेश एक छोटे शहर में नौकरी करते  हैं | यहाँ शिक्षा की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बच्चों को दूसरे शहर के नामी हॉस्टल में डाल दिया | गर्मी की छुट्टियाँ हो रही हैं | कमर में साड़ी के पल्लू को खोंस कर स्मिता के सधे हुए हाथ एक कुशल रसोइये की तरह कभी एक कड़ाही में चल जाते तो कभी दूसरी कड़ाही में ..| गैस के चारों चूल्हों पर रखे  बर्तनों पर क्रमशः दौड़ती नजर उसके कुशल पाक-दक्ष होने का परिचय दे रही है |  कुछ ही देर में विभिन्न व्यंजनों की महक से पूरा घर महक गया | आज दोनों कड़ाही भी बहुत प्रसन्न हैं - लजीज व्यंजनों से लबालब जो हैं |                                       ...

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ 

अच्छे दिन ........आएंगे

लो , एक वर्ष और बीत गया , उम्र में एक अंक और बढ़ गया | सन्  2017 का हुआ शंखनाद , नववर्ष हुआ है आगाज | मैं हाथ जोड़ कर रही हूँ प्रार्थना , प्रभु , सुन लो मेरी अरज | मेरा भारत सदा रहे महान , आमजन का बना रहे स्वाभिमान | भूखे को रोटी मिले , प्यासे को पानी मिले | ये बाते हुई बड़ी पुरानी , अब तो समस्याएं जटिल नई | सुनहरे भारत का है एक सपना , गाँव -गाँव साक्षरता - अभियान चले | शिक्षा ऐसी जो दे सीखने के अवसर , हर युवा को मुहैय्या हो रोजगार | पग - पग पर है जीवन में संकट , रेल यात्रा भी नहीं रही सुरक्षित | प्रभु , यात्री - सुरक्षा पर दिला दो ध्यान , जिस से घर-परिवार सदा रहे तनाव मुक्त | यहाँ अस्पताल है खुद बीमार , यह कैसे सुने हमारी गुहार | प्रभु , इन्हें ही बनाओ निरोग , जिस से हो रोगों की रोकथाम नोटबंदी ने मचाया बड़ा दंगल , ' कैशलेश ' बनी मृगमरीचिका | हे प्रभु , भ्रष्टाचार का हो समापन , सुकून भरा हो जीवन - यापन | खातों में हैं रुपये पड़े हुए , पर पाने को हम तरस रहे | प्रभु , कतारें करवा दो कुछ छोटी , रकम दिलवा दो कुछ मोटी | प्रभु, दिवा - स्वप्न नहीं म...