वर्ष का आखिरी महीना है , काम का जोर कुछ ज्यादा ही रहा | नीरज हमेशा अपने काम के प्रति वफादार रहा |ऑफिस में अपने सहयोगियों के साथ व्यवहार भी मिलनसार ही रहा है |पर , आज जरा सी चूक से टेंडर पास नहीं हुआ | कंपनी को काफी नुकसान हो गया | काफी रात बीत चुकी है , पर नीरज की आँखों से नींद गायब ही है | कानों में बॉस के ताने गूंज रहे हैं -' नीरज , तुमसे एक काम ढंग से नहीं हो पाया | अब तुम्हें रिटायर हो जाना चाहिए | इस से तो बेहतर यही होता मैं यह जिम्मेदारी सुरेश को ही सौंप देता |' तानेबाजी ,कड़वे बोलों के द्वारा अवहेलना एवं नफ़रत जाहिर हो ही जाती है |नींद तो आ नहीं रही , नीरज कमरे में चहलकदमी करने लगा | शीशे के सामने खड़ा हो गया -' क्या मैं उम्रदराज हो गया ? सुरेश मुझसे जूनियर है , वह खुद मुझ से सुझाव लेता है |' घडी देखी -'अभी तीन ही बजे हैं | मेरी आवाज से नीना की आँख खुल जायेगी |' नीरज लेट गया | फिर आँख ऐसी लगी कि नौ बजे ही खुली | बिटिया कॉलेज जा चुकी | उठा, अखबार पर निगाह डाली,पर टिकी नहीं | नीना चाय- बिस्किट ले आई | दोनों ने साथ में चाय पी | नीना बोली -" आज मैं...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !