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Showing posts from January, 2019

अखबार वाला

          सुबह के छः बजे गए। रजाई में से मुंह निकाल कर देखा- श्रीमान अभी सो रहे हैं। आज तो कड़ाके की ठंड है, रजाई में से निकलने का मन ही नहीं कर रहा है। रविवार है, उठने की जल्दी भी नहीं। मैंने पुनः रजाई में खुद को समेट लिया। दरवाजे की घंटी बजी,'इस समय कौन आया होगा?' फिर भी यह सोच कर दुबकी रही कि किसी ने गलती से घंटी बजाई होगी! अब तो कई बार घंटी बज गई। उधर से आवाज आई-'अखबार'। मैं ही चिल्ला पड़ी-"अरे, तो डाल दो ना!" "आंटी, आज बिल भी लाया हूँ।"             अलसाई आंखों से उठी, शॉल ओढ़कर दरवाजा खोला। नींद में डूबी आंखे जब अखबारवाले पर पड़ी, आँखे खुली रह गई। मटमैली, भीगी टोपी,लम्बे गमछे से कनपटी को ढांपे हुए, कांपता हुआ वह दरवाजे पर खड़ा था। आज काफी दिनों बाद उसे देखा था। " आंटी, वो शर्माजी बाहर चले गए हैं, उनके तीन महीने के रुपए बकाया हैं। आज रुपयों की सख्त जरूरत है।"             मैं स्तब्ध-सी उसे देखने लगी। वह रोज दरवाजे की सांकल में अखबार अटका जाता था। उसने मुझे बिल पकड़ाया, मैंने उसके हिसाब से रुपये दिए। व...