सुबह के छः बजे गए। रजाई में से मुंह निकाल कर देखा- श्रीमान अभी सो रहे हैं। आज तो कड़ाके की ठंड है, रजाई में से निकलने का मन ही नहीं कर रहा है। रविवार है, उठने की जल्दी भी नहीं। मैंने पुनः रजाई में खुद को समेट लिया। दरवाजे की घंटी बजी,'इस समय कौन आया होगा?' फिर भी यह सोच कर दुबकी रही कि किसी ने गलती से घंटी बजाई होगी! अब तो कई बार घंटी बज गई। उधर से आवाज आई-'अखबार'। मैं ही चिल्ला पड़ी-"अरे, तो डाल दो ना!" "आंटी, आज बिल भी लाया हूँ।" अलसाई आंखों से उठी, शॉल ओढ़कर दरवाजा खोला। नींद में डूबी आंखे जब अखबारवाले पर पड़ी, आँखे खुली रह गई। मटमैली, भीगी टोपी,लम्बे गमछे से कनपटी को ढांपे हुए, कांपता हुआ वह दरवाजे पर खड़ा था। आज काफी दिनों बाद उसे देखा था। " आंटी, वो शर्माजी बाहर चले गए हैं, उनके तीन महीने के रुपए बकाया हैं। आज रुपयों की सख्त जरूरत है।" मैं स्तब्ध-सी उसे देखने लगी। वह रोज दरवाजे की सांकल में अखबार अटका जाता था। उसने मुझे बिल पकड़ाया, मैंने उसके हिसाब से रुपये दिए। व...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !