बरस रही है ज्वाला भारी , तप रही है धरती सारी | उगल रहा है रवि - अनल , चाँद भी नहीं रहा शीतल | स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप , अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप | असहनीय और तड़पाती ये पछवा , धूल धूसरित लू और ये शुष्क हवा | शत-शत नमन है हलधर को , सह जाते धूप के इस कहर को | फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे , ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे | वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान , गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार | प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं , ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !