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Showing posts from April, 2017

बरस रही है ज्वाला भारी

बरस रही है ज्वाला भारी , तप रही है धरती सारी | उगल रहा है रवि - अनल , चाँद भी नहीं रहा शीतल | स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप , अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप | असहनीय और तड़पाती ये पछवा  , धूल  धूसरित लू और ये शुष्क हवा | शत-शत नमन है हलधर को , सह जाते धूप के इस कहर को | फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे , ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे | वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान , गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार | प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं , ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |

मुआवजा

                रामदीन अपनी पोटली लेकर बस में चढ़ गया | बस में चदते ही पोटली कुलमुलाई , कुछ हलचल हुई | कंडक्टर चिल्ला पड़ा - " क्या है बे इसमें ? " रामदीन - " इसमें एक छोटी सी बत्तख है | कंडक्टर - " चल टिकट ले  , दो टिकट के पैसे निकाल | रामदीन - " हुजूर , यह पोटली तो मेरी गोद में रहेगी | लोग तो बड़े-बड़े सामन ले कर चढ़े हैं | कंडक्टर - " पर इस बत्तख में प्राण हैं , तो मुसाफिर हुई ना ! "                  आखिर रामदीन को दो टिकिट के पैसे देने ही पड़े | बस शहर से बाहर निकली ही थी , ड्राईवर का मोबाइल बोल पड़ा | मोबाइल  पर बात करने में बस का नियंत्रण बिगड़ गया और समान से लदे एक ट्रक से टकरा गई | एक बहुत बड़ा हादसा हो गया | कई मुसाफि मर गए और कई घायल हो गए | रामदीन के भी काफी चोटें आई |                     रोडवेज ने सभी मृतकों के आश्रितों को 50 -50 हजार रुपये और घायलों को 5-5 हजार रुपये मुआवजे के तौर पर देने की घोषणा कर दी | रामदीन भी रोडवेज से मुआवजे क...

आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में

उदासी में जब कोई नहीं होता साथ , विश्वास है-वो तो सदा रहता है साथ | विश्वास का नहीं होता कोई आकार , इसलिए ' वो ' भगवान है निराकार हर पल, हर घड़ी में इबादत की , प्रार्थी बन मंदिरों में घंटनाद किए | इस आस्था ने मुझे आस्तिक बना दिया , हर हालात में उस पर निर्भर बना दिया | राह पर चलते , जब मंज़र बदल जाते हैं , उम्मीद टूटने पर विचार ही बदल जाते हैं | जीवन के झंझावात में मैं चूर हो गई , उसके अहसास की आस्था ही टूट गई | व्यर्थ है विश्वास, उस झूठी आशा पर , व्यर्थ है विश्वास , उस मुग़ालता पर | एक पल ही में मैं नास्तिक बन गई , जो हासिल था उसे ही क़बूल कर गई | आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर से, उबर गई मैं अब इस उलझन से | दर्द का अहसास हो या सुख की चाह , ईश की मौजूदगी दिखाती सदा राह | उसके होने में ही है स्वयं पर विश्वास , मेहनत से ही बढ़ रही पूरी आस |