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Showing posts from 2019

दरकते रिश्ते

            'काश, मेरे पंख होते और मैं उड़ पाती !' आज रीना के देहांत की खबर ने रेखा को विचलित कर दिया। रेखा के छोटे भाई अर्णव की पत्नी रीना। आज भाई को मेरी जरूरत है, पर नकुल की इजाजत के बिना पीहर जाना- अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। आज मुझे माँ और भाई के पास होना चाहिए। अर्णव के बच्चे बुआ का बाट जोहते ही होंगे ! कुछ ही दिन पहले पड़ोस की दीपा ने रीना की बीमारी के समाचार दिए थे। नकुल से जिक्र किया तो चिल्ला पड़े-'पहले अपना घर संभाल लो।' महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है, पर दरवाजे पर दस्तक दे सकने का आश्वासन हमेशा साथ होता है। अब नकुल के गुस्से के डर से रेखा मायके  के दरवाजे पर दस्तक देना तो दूर, देहरी पर पहुंचने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही है।             हवा का एक झौंका आया, अतीत के पन्नों पर से धूल झड़ने लगी। नकुल की ऑटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट्स की फैक्टरी बढ़िया चल रही थी। अर्णव अपनी नौकरी से खुश नहीं था। नकुल ने अर्णव को अपनी फैक्टरी में लगा लिया। काम की सभी बारीक...

पिता

            जया और रिया दो बेटियाँ हैं - मेरी। मैं बहुत गौरान्वित महसूस करती हूं कि दोनों बेटियां सुशील और गुणी हैं। हमारे दिए संस्कार विफल नहीं हुए। जया का विवाह हो गया। रिया की भी शिक्षा पूरी हो जाएगी। रोहन ने रिया के लिए वर देखना शुरू कर दिया है। ऐसा वर, जिसमें बेटी से ज्यादा काबिलियत हो। एक पिता की चाह है- लड़का सर्वगुणसम्पन्न हो। ऑफिस से आने के बाद घंटों कम्प्यूटर पर 'वर-तलाश-कार्यक्रम' जारी रहता, साथ ही फोनों का सिलसिला भी। मैं जानती हूं- रोहन बेटियों के प्रति हमेशा संवेदनशील रहे।             मुझे अपने स्कूल के दिन याद हो आए। मैं संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी। माँ और दादी को कह कर अपनी बात पापा तक पहुंचाती थी। अपनों से बड़ों के सामने पापा भी मुझे प्यार करने में संकोच किया करते थे। भावनाओं को अभिव्यक्त करने में पापा हिचकिचाते थे, बड़ों का लिहाज रखते थे, पर मन के भीतर अथाह प्रेम भरा होता था। वे अपने अहसासों को जज्ब किए रहते थे। कॉलेज में मैंने दाखिला लिया तो पापा मेरे लिए 'शक्तिस्तम्भ' रहे। बंदिशों भारी हिदायतें, रूखी सी हंसी औ...

स्वागत बहू का

स्वागत तुम्हारा बहू इस घर में, सदा खुश रहो, अपने घर में। नए घर, नए रिश्तों को को थाम, करती रहो, रोशन दो घरों के नाम। नयनों में है तुम्हारे, हजार सपने, यह घर, हम सब हैं तुम्हारे अपने। वादा है, तुमसे चाहे जैसी हो घड़ी, पाओगी सदा मुझे अपने पास खड़ी। बेटी से बहू बन, तुम आई हो, खुशियों की सौगात घर में लाई हो। तुम हो इस कुल की लाज, हंसते - हंसते निभाना रस्मो रिवाज। मेरी ताकत है तुम्हारा हमसफ़र, हंसते मुस्कुराते गुजारो जीवन डगर। तुम भी मेरी ताकत बन जाओ, इस परिवार की कड़ी से जुड़ जाओ। मेरा दामन खुशियों से भर जाएगा, मेरा बेटा बन 'हमसफ़र' साथ निभाएगा। अपने जीवन के सपनों को सच बनाना, अपने घर को सदा 'खुशमय' बनाना।

मां की पाती बेटी के नाम

            प्यारी लाडो, सदा खुश रहो। फोन, व्हाट्सअप द्वारा तुमसे संपर्क बना रहता है। फिर भी पत्र लिख रही हूं, जिससे जब-तब तुम मेरे स्पर्श को अनुभव करती रहो। पत्र द्वारा मैं अपने विचार सांझा कर रही हूं, इसे लिखने में मुझे खुशी और इत्मीनान भी महसूस हो रहा है।              जानती हो, मैं एक वकील बनना चाहती थी, पर बन न सकी। आज तुम्हारे द्वारा मैं अपना सपना पूरा होते देख रही हूं। जब घर में पुरानी परम्पराओं और रूढ़ियों के विरोध में तुम मेरे हक और अधिकार के लिए सबसे संघर्ष करती थी, तो तुम्हारी दादी मुस्कराकर कहती- 'यह लड़की वकील ही बनेगी, इससे कोई जीत नहीं सकता।' वकालत करने के बाद समाज के प्रति भी तुम्हारी जिम्म्मेदारी बढ़ जाएगी। आज समाज में बहशी, दरिंदे, भूखे आदमखोरों ने आतंक फैला रखा है, तुम्हें इन्हें दंडित कर नारी का मान-सम्मान बढ़ाना होगा। याद है-पिछले वर्ष दहेज प्रथा से प्रताड़ित होकर पड़ोसी गुप्ताजी की बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। हम चाहते हैं-तुम दहेज-प्रथा से उत्पीड़ित व नारकीय जीवन झेल रही महिलाओं को न्याय द...

पॉपकॉर्न

            उसका नाम नीरव है, मतलब-शांत, शब्द रहित। परंतु यार दोस्त उसे 'पॉपकॉर्न' नाम से ही पुकारते हैं। नीरव को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आता है और मुंह फुला लेता है। मानो एक पिचका हुआ मक्के का दाना फूल कर पॉपकॉर्न बन गया हो। कभी कभी तो उस से बात करने में भी डर लगता। घर में भी नीरव के स्वभाव से सब परेशान हैं। कभी खाना पसंद नहीं आया, पापा की कोई बात सही नहीं लगी, भाई ने उसकी कलम ले ली, बस गुस्सा होने का मौका मिलना चाहिए। माँ तो प्रायः कहा करती- 'नीरव ने शांति से खाना खा लिया, तो समझो घर के सभी सदस्यों ने खा लिया।'             आज गाँव से ताऊ आने वाले हैं। नीरव के पिता के 'ताऊ' , यूं कहा जाय- 'जगत ताऊ'। बड़े ही सुलझे और आधुनिक विचारों के इंसान और सभी के शुभचिंतक। आदेश हुआ-कॉलेज के बाद नीरव ही ताऊ को लाने स्टेशन जाएगा। ट्रेन समय पर आ गई। ताऊ के साथ प्लेटफॉर्म से बाहर निकला- एक भिखारी बच्चे ने नीरव के आगे हाथ फैला दिए। नीरव गुस्से में चिल्लाने लगा- 'यही काम है, जब देखो हाथ पसार लेते हो।' इतने मैं एक दोस्त ने कंधे पर हाथ रखा, बोला-...

दीवार

     उस दिन पड़ोसी से क्या हुई तकरार,      उसने खड़ी कर दी दो ईंटों की दीवार।      गर्दन टेढ़ी कर झाँकता रहा, मन रहा बैचेन।      दो मकानों के बीच दीवार बना, कैसे मिल उसे चैन!      कहते हैं दीवारों के भी होते हैं कान,      कुछ सुन जाय, जरूर देती होगी ध्यान।      पर मेरी तरफ की दीवार न सुन सकती है,      मूक- बधिर है, न बोल सकती है।      बारिश हुई, एक जगह से ईंट निकल गई,      देखा मैंने मोखले में चिड़िया ही बस गई,      तिनके, पत्तों के योग से घोंसला बना लिया,      मेरी ओर से निश्चिन्त हो, उसने परिवार बसा लिया।      दो ईंटों के बीच एक बीज सुगबुगाया,      नमी मिली, मिली जान, वह अखुआया।      लो दीवार के बीच एक पौधा भी उग आया,      निराश न रहो- यह पौधा सीखा गया।      मैं निहार रहा दीवार, बैठा घर के बाहर,      प...

दायित्व

            रघुनाथ का परिवार छोटा ही था-एक बेटा, एक बेटी। नौकरी के रहते रघुनाथ ने अपना घर बना लिया। दो रूम, बैठक और रसोई-उनके परिवार के लिए पर्याप्त था। दोनों कमरों में शौचालय की व्यवस्था रखी और एक शौचालय आंगन में भी बनवा लिया। दोनों बच्चों की शादी हो गई। बेटी बिदा हो गई, बहू घर आ गई। दूसरा रूम बेटे-बहू के लिए तैयार हो गया। समय बड़े सुख-चैन से बीतता रहा। बेटे अक्षय का परिवार भी बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद रघुनाथ की पत्नी का देहांत हो गया। पत्नी के देहांत से रघुनाथ को एकाकी जीवन दूभर लगने लगा। वे पूरी तरह से पत्नी के सहयोग के आदी हो गए थे। शारीरिक अशक्तता में पनपी पर निर्भरता से वे कुंठित रहने लगे,पर उन्होंने अपनी टूटन का आभास नहीं होने दिया। धीरे-धीरे जीवन अपनी गति पकड़ने लगा। इधर अक्षय का बेटा हाई स्कूल पास कर चुका।             आज रघुनाथ का मन हुआ- बेटी से मिल आऊं। दो दिन के लिए बेटी के घर चले गए। दो दिन बाद बेटी ही घर छोड़ने आई। दोनों ने देखा-रघुनाथ की अलमारी बैठक में रख दी गई है और कोने में पलंग भी। उनका कमरा अक्षय के बेटे के लि...

मृत्युभोज

            इनके जिगरी दोस्त विनोद का देहांत हो गया। दोनों ने साथ में पढ़ाई की और साथ में ही नौकरी की। मेरा और भाभीजी का रिश्ता भी दोस्ताना ही रहा। विनोद भाईसाहब अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। भाई साहब को हार्ट अटैक क्या आया, घर की छत ही उड़ गई। जब अपने करीबी के घर में गमी हो तो मन में हौल उठता है, मन बड़े असमंजस में रहता है, न ही घर में मन लगता है और न ही उस माहौल के लिए पैर उठते हैं।             अगले ही दिन विनोद भाईसाहब की बड़ी बहन और जीजाजी आ गए। मन को बड़ी राहत मिली कि भाभीजी के साथ दुःख बाँटने के लिए उनके घर का ही कोई सदस्य आया। तीन दिन माहौल गमगीन ही बना रहा। इधर-उधर की बातें करने से किसी का मन बहल जाता है, यह सोचना गलत है। जो दुःख में है, उसके लिए हर शब्द शोर है। भाभी निस्पन्द और निःशब्द ही बनी रही। जीजी और जीजाजी ही आने जाने वालों को संभालते रहे। चौथे दिन--भाईसाहब की असामयिक मृत्यु से जीजी इतनी जल्दी उबर जाएंगी-यह सोचा नहीं था। अड़ोसी-पड़ोसियों से चल रही उनकी फुफुसाहट से पता चला कि वे बाजारों की जानकारी ले रही हैं। इतने ...

शुक्रिया

              कर दूँ अभिषिक्त 'शुक्रिया' के बोलों से, जीवन हुआ सार्थक, इन रिश्तों से। मंशा यही-स्नेहपूर्ण संबंध बने रहें, भविष्य में भी लेन-देन यूं ही चलते रहें। प्रभु, 'शुक्रिया' चुनौती, जोखिम देने के लिए, जरूरी है जीने की कला सीखने के लिए। 'शुक्रिया' करूँ तो कहाँ, कब तक करूँ? तेरी हर कृपा के आगे मैं सिर झुकाया करूँ! शिक्षक, माता-पिता पथ-प्रदर्शक बने रहे, 'शुक्रिया' अस्थिर जीवन को स्थिरता देते रहे। रिश्ते, सगे-संबंधी बढ़ाते रहे प्रमाद, सहेज रखी है मैंने उनकी मीठी याद। 'शुक्रिया' जिन्हें देख सदा मैं मुस्कराती रही, 'शुक्रिया'उस सखी का जो सदा हँसाती रही। 'शुक्रिया' जिन्होंने मेरी गलती को इंगित किया, 'शुक्रिया' 'इन' का जिन्होंने हर पल साथ दिया। साँसों पर अवलम्बित काया चलते चलते हुई चूर, 'शुक्रिया' दो स्नेह शब्द मिले, थकावट हुई दूर । रेलयात्रा में एक नन्ही किलकारी दे गई रंग, 'शुक्रिया' पल भर में मेरी बैचेनी हुई भंग। मेल बढ़ाते, स्नेह बाँटते, उम्र यूं ही गुजर जाए, आभार तहे दिल से...

ताईजी

            मेरी पत्नी की पहली डिलीवरी होनी है, वह पीहर चली गई। इस विषय में अनभिज्ञता होने के कारण यह निर्णय ले ही लिया। गाँव में ताई जी को पता चला-'मोनू अकेला है, खाने की दिक्कत होगी।' बैचेन हो गई। अपने मोनू के पास चली आई। मैं मानवेन्द्र, पर मेरी ताई के लिए मोनू। गाँव में हमारा संयुक्त परिवार-ताई, ताऊजी,  माता-पिता और हम दो भाई। ताईजी के कोई संतान नहीं हुई। माँ और ताईजी में देवरानी-जेठानी से व्यवहार कम, बहनों-सा प्रेम ज्यादा रहा। ताऊजी जल्दी ही गुजर गए, कुछ वर्षों बाद माँ-पिताजी भी। ताईजी बड़े भैया के पास गाँव में ही रह गई, पर दिल के एक कोने में 'मोनू' के प्रति उनका प्रेम सदा ही उमड़ा। जब तब मेरे पास आई, इन्हें शहरी जीवन रास नहीं आया।             ताईजी को सफाई-धुलाई की आदत है। गाँव में तो नदी बह रही है, पर यहाँ पानी की जटिल समस्या है। सबेरे चार बजे उठकर उन्होंने अपने बाँके बिहारी को नहलाया, फिर खुद.....। दिन भर के खर्चे के हिसाब से जमा पानी की स्थिति देख कर मैं हाथ मुँह धोकर ही ऑफिस गया। ताईजी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव द...

वीरांगना

            पुलवामा अटैक में नीरज राठौड़ शहीद हो गए। श्रीमती रेणू नीरज राठौड़ अब एक शहीद की पत्नी वीरांगना रेणू नीरज चौधरी कहलाने लगी। 15 दिन में ही जीवन अर्थहीन लगने लगा, पूरा जीवन कैसे कटेगा? विवाह को 10 वर्ष हुए। आठ वर्ष का बेटा और दो वर्ष की बेटी, घर में सास-ससुर।             सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में लगातार शिरकत करती रेणू अब घबराने लगी है। मंचों पर तो ये नेता देशनिष्ठा से लबरेज रहते, पर कार्यक्रम निपटते ही सड़कों पर अपना अलग नजारा पेश करते। स्टेज पर वक्ताओं के मुख से पति की शहादत के प्रति सहानुभूति वाले निकले शब्द आंसुओं को रोक नहीं पाते। महिला संस्था या समाज सेवी संस्था के लोग जब ढाढस बांधते, बच्चों को पुचकारते, तो सभी शुभचिंतक और अपने से जान पड़ते। इन संस्थाओं ने रेणू को एक रॉल-मॉडल बना दिया है, उनकी परिभाषा के अनुसार पति की मौत के बावजूद वह सांसारिक तौर पर बिखरी नहीं है। देशभक्ति की लम्बी-चौड़ी तकरीरों को सुन खुद फख्र महसूस करती , पर घर में घुसते ही ऐसा जान पड़ता, मानो एक खंडहर में खड़ी है। अपनी हमउम्र  महिल...

बातें हैं बचपन से पचपन तक की

बातें हैं बचपन से पचपन तक की, दिल-ओ-जेहन में बसी मीठी कड़वी यादों की। तब से अब तक भाग रही जिंदगी यूँ हीं, सुख का छोर मानों छूट गया कहीं। तब वाले इतवार अब नहीं आते, साथ बैठ अब हम नहीं बतियाते। टी वी पर 'रामायण, महाभारत'अब नहीं आते, छत पर एंटीना घुमाने अब नहीं जाते। 'चील उड़, घोड़ा उड़' में ठहाके लगना, लेंस से कागज जला- बहादुर बनना। पोसम्पा, पिठ्ठू गरम में यारों को मात देना, 'इमला' में शत प्रतिशत अव्वल आना। चवन्नी की कुल्फियों से शहंशाह होना, पेड़ पर चढ़ आम चुराना। दोस्तों से नाराजगी के नाम पर कट्टी होना, दो उंगलियाँ जोड़ दोस्ती शुरू करना। दूध के भगौने की खुरचन में बीता बचपन, हंसते-रोते बीत गया यह बचपन। पड़ोसी के फोन से जुड़ा मोहल्ला, सुख दुख का साथी था पूरा मोहल्ला। यादों के झरोखे से पहुंची पचपन में, बच्चा बन जाने को तड़प उठ रही मन में। जीवन की छांह सिमट रह गई नसीब में, खोए पल पुनः जीने की चाह रह गई ख्वाब में। सुंदर राइटिंग खो गई कंप्यूटर में, पत्रों का नशा हुआ काफूर ईमेल में। जेब में दो मोबाइल, पर संवाद नहीं, आज दोस्तों के पास घड़ी है, पर ...

अखबार वाला

          सुबह के छः बजे गए। रजाई में से मुंह निकाल कर देखा- श्रीमान अभी सो रहे हैं। आज तो कड़ाके की ठंड है, रजाई में से निकलने का मन ही नहीं कर रहा है। रविवार है, उठने की जल्दी भी नहीं। मैंने पुनः रजाई में खुद को समेट लिया। दरवाजे की घंटी बजी,'इस समय कौन आया होगा?' फिर भी यह सोच कर दुबकी रही कि किसी ने गलती से घंटी बजाई होगी! अब तो कई बार घंटी बज गई। उधर से आवाज आई-'अखबार'। मैं ही चिल्ला पड़ी-"अरे, तो डाल दो ना!" "आंटी, आज बिल भी लाया हूँ।"             अलसाई आंखों से उठी, शॉल ओढ़कर दरवाजा खोला। नींद में डूबी आंखे जब अखबारवाले पर पड़ी, आँखे खुली रह गई। मटमैली, भीगी टोपी,लम्बे गमछे से कनपटी को ढांपे हुए, कांपता हुआ वह दरवाजे पर खड़ा था। आज काफी दिनों बाद उसे देखा था। " आंटी, वो शर्माजी बाहर चले गए हैं, उनके तीन महीने के रुपए बकाया हैं। आज रुपयों की सख्त जरूरत है।"             मैं स्तब्ध-सी उसे देखने लगी। वह रोज दरवाजे की सांकल में अखबार अटका जाता था। उसने मुझे बिल पकड़ाया, मैंने उसके हिसाब से रुपये दिए। व...