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बेबसी

          "मां , छुट्टियाँ शुरू हो गई, सेठ जी की बेटी कब आएगी ? जाते वक्त अपने बच्चों के कपड़े , किताबें मुझे दे जाती हैं । मुझे बहुत अच्छा लगता है ।"
सीता -" नहीं, इस वर्ष छुट्टियों में उनकी बेटी नहीं आएगी। सेठ जी का परिवार ही उनके पास जा रहा है-दो महीने के लिए। "
माँ-बेटी की बातें रामेश्वर सुन रहा था, सकपका गया-"तो क्या 2 महीने उनके घर पर कोई नहीं रहेगा ?" घड़ी की ओर देखते हुए सीता ने लक्ष्मी को स्कूल जाने के लिए कहा ।
सीता -" हाँ, सेठानी जी ने कहा है-2 महीने घर बंद रहेगा, तो कामह भी नहीं रहेगा। वे उन 2महीनों की तनख्वाह भी नहीं देंगी।"
"सीता, इस तरह तो बहुत परेशानी हो जाएगी। हम गरीबों के तो तनख्वाह पर खर्चे बंधे होते हैं। हमें बजट बना कर तय करना होता है- कहाँ कटौती करके किस आवश्यकता को पूरा किया जाय ! जरूरी खर्चे तो रुकेंगे नही, भले कर्ज ही लिया जाय!"
"लक्ष्मी के बापू, कल सेठजी का बेटा 50 हजार का मोबाइल लाया, बोला-जीजी के पास जाऊंगा, नया मोबाइल चाहिए। सेठानी जी ने अपने लिये, बेटी के लिए , उसके बच्चों के लिए महंगे कपड़े और कीमती उपहार खरीदे। तीन दिन बाद की उनकी हवाई जहाज की टिकट बनी है। सेठानी जी कह रही थी- ट्रेन से 24 घंटे का समय लगता है , हवाई जहाज से 2 घंटे में पहुंच जाएंगे।"
सीता कुछ गंभीर हो गई, बोली -"लक्ष्मी के बापू , मैंने गौर किया है- जो कम चलते हैं, उनके पास जूतों के अंबार लगे होते हैं। जो पैदल चलने को मजबूर हैं , उनके तलवे और जूतों में ज्यादा अंतर नहीं। यह तो अन्याय है।"
रामेश्वर-" हे प्रभु, गरीब इतना बेबस और लाचार क्यों? उसे कब तक अपनी बेबसी अपने दामन में छिपाकर रखनी होगी ? हमारा ही जीवन इतना कुंठित क्यों? सीता, इतने खर्चों के बीच सेठानी जी तुम्हें तनख्वाह दे दें, तो उन पर खास बोझ नहीं पड़ेगा। तुमने तो अपने काम से छुट्टी ली नहीं! कल ही मैं लक्ष्मी को कबीरदास जी का दोहा समझा रहा था-
  चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी न घट्यो नीर। "

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