Skip to main content

मृगतृष्णा

माटी का तन, हर पल लिखे एक नई कहानी,
जग मिथ्या, केवल जन्म-मरण की निशानी।
आकुल-व्याकुल मन कभी न स्थिर रह पाता है,
सपनों की रुनझुन में ही जीवन कट जाता है।

ऊपर से संतोष दिखा, फिर भी अंतर प्यासा है,
मृगतृष्णा के जाल में फंसा मन घबराता है।
सागर में रह कर भी प्यास नहीं बुझती पूरी,
जैसे मृग ढूंढता है , जंगल में कस्तूरी।

तमाम उन परछाइयों के पीछे हम भाग रहे,
प्यास बुझाने को हैं असफल हो रहे।
शहर की भागमभाग, जीवन का जंजाल,
दूर-दूर तक फैला है, मरीचिका का जाल।

जाने कैसी ये मृगतृष्णा, अखंड सुख के चाहत की,
हर बार यही सोचा करती, लूँगी अब साँस राहत की।
बस , यह आखिरी साध पूर्ण हो जाए ,
हे प्रभु, मेरी चाहतों पर विराम लग जाए !

पर, फिर एक नई चाह जग जाती,
ऐसी अनंत चाहतों के जंजीर में मैं फंस जाती।
क्या इन जरूरतों की धूप कभी ढलेगी ?
पता नहीं , यह मृगतृष्णा कब तक छलेगी ?

Comments

Popular posts from this blog

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ