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मृगतृष्णा

माटी का तन, हर पल लिखे एक नई कहानी,
जग मिथ्या, केवल जन्म-मरण की निशानी।
आकुल-व्याकुल मन कभी न स्थिर रह पाता है,
सपनों की रुनझुन में ही जीवन कट जाता है।

ऊपर से संतोष दिखा, फिर भी अंतर प्यासा है,
मृगतृष्णा के जाल में फंसा मन घबराता है।
सागर में रह कर भी प्यास नहीं बुझती पूरी,
जैसे मृग ढूंढता है , जंगल में कस्तूरी।

तमाम उन परछाइयों के पीछे हम भाग रहे,
प्यास बुझाने को हैं असफल हो रहे।
शहर की भागमभाग, जीवन का जंजाल,
दूर-दूर तक फैला है, मरीचिका का जाल।

जाने कैसी ये मृगतृष्णा, अखंड सुख के चाहत की,
हर बार यही सोचा करती, लूँगी अब साँस राहत की।
बस , यह आखिरी साध पूर्ण हो जाए ,
हे प्रभु, मेरी चाहतों पर विराम लग जाए !

पर, फिर एक नई चाह जग जाती,
ऐसी अनंत चाहतों के जंजीर में मैं फंस जाती।
क्या इन जरूरतों की धूप कभी ढलेगी ?
पता नहीं , यह मृगतृष्णा कब तक छलेगी ?

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