राजनीति अपनी अनुकूलता तलाशने के लिए जानी जाती है। इस समय चुनावी सरगर्मी रफ्तार ले चुकी है। सभी राजनीति दल व नेता हर जाति वर्ग को रिझाने में कोई कमी नहीं रख रहे हैं। दलित वर्ग को अपनी ओर करने के लिए सबसे ज्यादा उनके हित में काम करने वाली पार्टी की छवि बनाने के लिए उठापटक हो रही है। उनके साथ भोजन करना, उनके कंधों पर हाथ रख कर आत्मीयता दिखाना, उनके साथ फोटो खिंचवाना-राजनैतिक दांवपेंच ही तो है। दलितों में अपनी पैठ को बढ़ाने के लिए सामाजिक समरसता कार्यक्रमों का आयोजन जोर शोर से हो रहा है।
नेताजी ने कलेक्टर के द्वारा दलितों की बस्ती की जानकारी ली। तय हुआ- उनकी बस्ती में 'समरसता भोज' रखा जाय। हरिया जाटव का घर दलित मोहल्ले के बींचों बीच में है, वहीं भोजन किया जाय, इससे पूरा मोहल्ला कवर हो जाएगा। दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए खेती द्वारा मशक्कत करने वाले हरिया के परिवार मे -पत्नी और दो बच्चे। सप्ताह भर पहले हरिया को सूचित कर दिया गया- 'नेताजी तुम्हारे घर भोजन करेंगे।' अपने ही परिवार का पेट भरने में असमर्थ हरिया भला नेताजी को क्या खिला सकेगा ? चेहरे पर प्रश्नचिन्ह भाव देख उसे आश्वस्त कराया गया-तुम परेशान मत होओ, सब व्यवस्था हो जाएगी। कलेक्टर ने अपने मातहतों को आदेश दिया- गांव पहुंचने का रास्ता ठीक किया जाय। रास्ता भले कच्चा हो, पर मिट्टी डालकर सपाट कर दो, जिससे कार मोहल्ले तक पहुंच सके। गांव में बिजली के खंभे लगे हैं , पर बिजली नहीं है। लो जी , बिजली पहुंचाई गई। हरिया के घर अंधेरा है। उसकी झोपड़ी के छप्पर में बड़े छेद कर के दो बल्ब लटकाने की व्यवस्था की गई। सड़क से हरिया के घर पहुंचने तक कुछ ट्यूब लाइटों से बस्ती जगमगा गई।
काम लंबा था , युध्द स्तर से काम को अंजाम देना शुरू किया गया। कलेक्टर साहब ने आदेश दिया था-खर्चे की चिंता नहीं करना। काम सही ढंग से और सही समय पर होना चाहिए। सही ढंग और सही समय की खुली छूट में खुली लूट की उम्मीद जग ही जाती है। हुआ भी वही।
वह दिन भी आ गया। हरिया का घर चमक गया।घर में एक साधारण लाल कारपेट बिछ गया। बच्चों को साफ सुथरा कर साफ कपड़े पहनाए गए। हरिया की जोरू आज मुस्करा रही है। घर और परिवार का रूप ही बदल गया। सपने सच हों, क्षणिक ही सही, तो मुस्कान आ ही जाती है। पर हरिया परेशान है। नेताजी के शुभचिन्तकों ने आ कर हरिया की झोपड़ी के चारों तरफ निरीक्षण किया-सुरक्षा की दृष्टि से। नेताजी के आने से पहले कैटरर के द्वारा बड़े भगौनों में सब्जी, रोटी, जलेबी पहुंचाए गए। अखबार के संवावदाता पहुंच गए-कैमरे और माइक के साथ।
लो, नेताजी भी आ गए। कार्यकर्ताओं का हुजूम, कारों का काफिला, चारों तरफ उड़ती धूल का गुबार-आज बस्ती में रौनक है। सभी ने नेताजी को प्रणाम किया। नेताजी ने पूछ ही लिया- "हरिया, खेती-बाड़ी कैसी चल रही है ?"
"हुजूर, इस बार तो सरकार ने किसानों को बढ़िया बीज दिए हैं, फसल बहुत अच्छी हुई है।"
नेताजी के सभी प्रश्नों की सूची के अनुसार हरिया को जवाब के लिए पहले ही तैयार कर लिया गया था। समरसता भोज के लिए लाल कारपेट पर पंगत लग गई। सभी दलित भोजन के लिए बैठ गए। हरिया के बगल में नेताजी। हरिया ने ख्वाब में भी ऐसा भोजन नहीं देखा था। बरसों से अतृप्त मन आज तृप्त हुआ।
काफिला जहां से आया, वहीं चला गया। कारपेट जहां से आया, वहीं चला गया। रह गए- झूठी पत्तलों के ढेर, पोस्टरों के बिखरते कागज और हरिया की झोपड़ी की छप्पर में किए गए दो छेद। जबरन लाई गई बिजली, कब नदारद हो गई, पता न चल सका। हाँ, एक समय का समरसता भोज, कई दिनों तक हर पार्टी के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
नेताजी ने कलेक्टर के द्वारा दलितों की बस्ती की जानकारी ली। तय हुआ- उनकी बस्ती में 'समरसता भोज' रखा जाय। हरिया जाटव का घर दलित मोहल्ले के बींचों बीच में है, वहीं भोजन किया जाय, इससे पूरा मोहल्ला कवर हो जाएगा। दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए खेती द्वारा मशक्कत करने वाले हरिया के परिवार मे -पत्नी और दो बच्चे। सप्ताह भर पहले हरिया को सूचित कर दिया गया- 'नेताजी तुम्हारे घर भोजन करेंगे।' अपने ही परिवार का पेट भरने में असमर्थ हरिया भला नेताजी को क्या खिला सकेगा ? चेहरे पर प्रश्नचिन्ह भाव देख उसे आश्वस्त कराया गया-तुम परेशान मत होओ, सब व्यवस्था हो जाएगी। कलेक्टर ने अपने मातहतों को आदेश दिया- गांव पहुंचने का रास्ता ठीक किया जाय। रास्ता भले कच्चा हो, पर मिट्टी डालकर सपाट कर दो, जिससे कार मोहल्ले तक पहुंच सके। गांव में बिजली के खंभे लगे हैं , पर बिजली नहीं है। लो जी , बिजली पहुंचाई गई। हरिया के घर अंधेरा है। उसकी झोपड़ी के छप्पर में बड़े छेद कर के दो बल्ब लटकाने की व्यवस्था की गई। सड़क से हरिया के घर पहुंचने तक कुछ ट्यूब लाइटों से बस्ती जगमगा गई।
काम लंबा था , युध्द स्तर से काम को अंजाम देना शुरू किया गया। कलेक्टर साहब ने आदेश दिया था-खर्चे की चिंता नहीं करना। काम सही ढंग से और सही समय पर होना चाहिए। सही ढंग और सही समय की खुली छूट में खुली लूट की उम्मीद जग ही जाती है। हुआ भी वही।
वह दिन भी आ गया। हरिया का घर चमक गया।घर में एक साधारण लाल कारपेट बिछ गया। बच्चों को साफ सुथरा कर साफ कपड़े पहनाए गए। हरिया की जोरू आज मुस्करा रही है। घर और परिवार का रूप ही बदल गया। सपने सच हों, क्षणिक ही सही, तो मुस्कान आ ही जाती है। पर हरिया परेशान है। नेताजी के शुभचिन्तकों ने आ कर हरिया की झोपड़ी के चारों तरफ निरीक्षण किया-सुरक्षा की दृष्टि से। नेताजी के आने से पहले कैटरर के द्वारा बड़े भगौनों में सब्जी, रोटी, जलेबी पहुंचाए गए। अखबार के संवावदाता पहुंच गए-कैमरे और माइक के साथ।
लो, नेताजी भी आ गए। कार्यकर्ताओं का हुजूम, कारों का काफिला, चारों तरफ उड़ती धूल का गुबार-आज बस्ती में रौनक है। सभी ने नेताजी को प्रणाम किया। नेताजी ने पूछ ही लिया- "हरिया, खेती-बाड़ी कैसी चल रही है ?"
"हुजूर, इस बार तो सरकार ने किसानों को बढ़िया बीज दिए हैं, फसल बहुत अच्छी हुई है।"
नेताजी के सभी प्रश्नों की सूची के अनुसार हरिया को जवाब के लिए पहले ही तैयार कर लिया गया था। समरसता भोज के लिए लाल कारपेट पर पंगत लग गई। सभी दलित भोजन के लिए बैठ गए। हरिया के बगल में नेताजी। हरिया ने ख्वाब में भी ऐसा भोजन नहीं देखा था। बरसों से अतृप्त मन आज तृप्त हुआ।
काफिला जहां से आया, वहीं चला गया। कारपेट जहां से आया, वहीं चला गया। रह गए- झूठी पत्तलों के ढेर, पोस्टरों के बिखरते कागज और हरिया की झोपड़ी की छप्पर में किए गए दो छेद। जबरन लाई गई बिजली, कब नदारद हो गई, पता न चल सका। हाँ, एक समय का समरसता भोज, कई दिनों तक हर पार्टी के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
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