इनके जिगरी दोस्त विनोद का देहांत हो गया। दोनों ने साथ में पढ़ाई की और साथ में ही नौकरी की। मेरा और भाभीजी का रिश्ता भी दोस्ताना ही रहा। विनोद भाईसाहब अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। भाई साहब को हार्ट अटैक क्या आया, घर की छत ही उड़ गई। जब अपने करीबी के घर में गमी हो तो मन में हौल उठता है, मन बड़े असमंजस में रहता है, न ही घर में मन लगता है और न ही उस माहौल के लिए पैर उठते हैं।
अगले ही दिन विनोद भाईसाहब की बड़ी बहन और जीजाजी आ गए। मन को बड़ी राहत मिली कि भाभीजी के साथ दुःख बाँटने के लिए उनके घर का ही कोई सदस्य आया। तीन दिन माहौल गमगीन ही बना रहा। इधर-उधर की बातें करने से किसी का मन बहल जाता है, यह सोचना गलत है। जो दुःख में है, उसके लिए हर शब्द शोर है। भाभी निस्पन्द और निःशब्द ही बनी रही। जीजी और जीजाजी ही आने जाने वालों को संभालते रहे। चौथे दिन--भाईसाहब की असामयिक मृत्यु से जीजी इतनी जल्दी उबर जाएंगी-यह सोचा नहीं था। अड़ोसी-पड़ोसियों से चल रही उनकी फुफुसाहट से पता चला कि वे बाजारों की जानकारी ले रही हैं। इतने बड़े शहर में आए हैं तो बिटिया की शादी की शॉपिंग भी कर लें।
तेरहवीं का दिन भी आ पहुंचा। विनोद भाईसाहब के भांजा-भांजी भी आ गए। जीजी ने मुझसे परिचय कराया-"दोनों को बुला ही लिया। मामा के लाडले थे, मामी भी खुश हो जाएगी।"
"हाँ, मामी के पास खुश होने के लिए यही तो बचा था "-मैं बुदबुदाई।
आज प्रसादी का दिन है, कहा जाय-मृत्युभोज है। इतने दिन पचासों मेहमान आते जाते रहे। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की-राशन, सब्जी, दूध कौन ला रहा है? कहाँ से आ रहा है? आज का भोज, तो रसूखदारों के लिए हैसियत दर्शाने का मौका होता है, लेकिन जो वैधव्य की आंच से झुलसा हुआ हो और जिसे अपनी पहाड़ सी जिंदगी एवं बच्चों का भविष्य अंधेरे में लग रहा हो-उनके लिए तो अभिशाप ही है। यदि इस भोज की व्यवस्था सुचारू रूप से न हो तो समाज हिकारत भारी निगाहों से देखता है।
आज जरूरत है-इन नियमों को बदलने की। इन नियमों का पालन अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाय, न की कर्ज से दबकर। एक खास बात- मेरा मानना है-अगर किसी से अपनापन महसूस न करें तो केवल दिखावे के लिए गमी में न जाएं। यह कोई खुशी का अवसर नहीं, जहाँ शक्ल दिखाकर आने को गिना जाता हो।
अगले ही दिन विनोद भाईसाहब की बड़ी बहन और जीजाजी आ गए। मन को बड़ी राहत मिली कि भाभीजी के साथ दुःख बाँटने के लिए उनके घर का ही कोई सदस्य आया। तीन दिन माहौल गमगीन ही बना रहा। इधर-उधर की बातें करने से किसी का मन बहल जाता है, यह सोचना गलत है। जो दुःख में है, उसके लिए हर शब्द शोर है। भाभी निस्पन्द और निःशब्द ही बनी रही। जीजी और जीजाजी ही आने जाने वालों को संभालते रहे। चौथे दिन--भाईसाहब की असामयिक मृत्यु से जीजी इतनी जल्दी उबर जाएंगी-यह सोचा नहीं था। अड़ोसी-पड़ोसियों से चल रही उनकी फुफुसाहट से पता चला कि वे बाजारों की जानकारी ले रही हैं। इतने बड़े शहर में आए हैं तो बिटिया की शादी की शॉपिंग भी कर लें।
तेरहवीं का दिन भी आ पहुंचा। विनोद भाईसाहब के भांजा-भांजी भी आ गए। जीजी ने मुझसे परिचय कराया-"दोनों को बुला ही लिया। मामा के लाडले थे, मामी भी खुश हो जाएगी।"
"हाँ, मामी के पास खुश होने के लिए यही तो बचा था "-मैं बुदबुदाई।
आज प्रसादी का दिन है, कहा जाय-मृत्युभोज है। इतने दिन पचासों मेहमान आते जाते रहे। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की-राशन, सब्जी, दूध कौन ला रहा है? कहाँ से आ रहा है? आज का भोज, तो रसूखदारों के लिए हैसियत दर्शाने का मौका होता है, लेकिन जो वैधव्य की आंच से झुलसा हुआ हो और जिसे अपनी पहाड़ सी जिंदगी एवं बच्चों का भविष्य अंधेरे में लग रहा हो-उनके लिए तो अभिशाप ही है। यदि इस भोज की व्यवस्था सुचारू रूप से न हो तो समाज हिकारत भारी निगाहों से देखता है।
आज जरूरत है-इन नियमों को बदलने की। इन नियमों का पालन अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाय, न की कर्ज से दबकर। एक खास बात- मेरा मानना है-अगर किसी से अपनापन महसूस न करें तो केवल दिखावे के लिए गमी में न जाएं। यह कोई खुशी का अवसर नहीं, जहाँ शक्ल दिखाकर आने को गिना जाता हो।
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