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पॉपकॉर्न

            उसका नाम नीरव है, मतलब-शांत, शब्द रहित। परंतु यार दोस्त उसे 'पॉपकॉर्न' नाम से ही पुकारते हैं। नीरव को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आता है और मुंह फुला लेता है। मानो एक पिचका हुआ मक्के का दाना फूल कर पॉपकॉर्न बन गया हो। कभी कभी तो उस से बात करने में भी डर लगता। घर में भी नीरव के स्वभाव से सब परेशान हैं। कभी खाना पसंद नहीं आया, पापा की कोई बात सही नहीं लगी, भाई ने उसकी कलम ले ली, बस गुस्सा होने का मौका मिलना चाहिए। माँ तो प्रायः कहा करती- 'नीरव ने शांति से खाना खा लिया, तो समझो घर के सभी सदस्यों ने खा लिया।'
            आज गाँव से ताऊ आने वाले हैं। नीरव के पिता के 'ताऊ' , यूं कहा जाय- 'जगत ताऊ'। बड़े ही सुलझे और आधुनिक विचारों के इंसान और सभी के शुभचिंतक। आदेश हुआ-कॉलेज के बाद नीरव ही ताऊ को लाने स्टेशन जाएगा। ट्रेन समय पर आ गई। ताऊ के साथ प्लेटफॉर्म से बाहर निकला- एक भिखारी बच्चे ने नीरव के आगे हाथ फैला दिए। नीरव गुस्से में चिल्लाने लगा- 'यही काम है, जब देखो हाथ पसार लेते हो।' इतने मैं एक दोस्त ने कंधे पर हाथ रखा, बोला- 'चल छोड़ पॉपकॉर्न।' नीरव आगे बढ़ गया। नीरव ने तीन रिक्शे वालों से बात की, पर कोई भी 50 रुपयों से कम लेने को तैयार नहीं और नीरव 40 रुपयों पर अड़ा रहा। गुस्से में बड़बड़ाता रहा- 'लूट मचा रखी है।' तभी एक रिक्शेवाला बोला- 'अच्छा, चलो भैया, 40 रुपए ही दे देना।' रिक्शे में बैठकर ताऊ ने पूछा- "तुम्हारा दोस्त तुम्हें पॉपकॉर्न क्यों पुकार रहा था ?"
"यूं ही आपस में एक दूसरे के नाम रखे हैं।"
इतने में रिक्शा टेढ़ा हो गया। दोनों ने स्वयं को संभाला। नीरव चिल्ला पड़ा- "रिक्शा चलाने भी नहीं आता। गड्ढा नहीं दिखा ?" रिक्शेवाला सहमा रहा।
            आज घर में भोजन में ताऊ की पसंद की मंगौड़ी और मेथी की सब्जी बनी है। नीरव भुनभुनाने लगा- " माँ, मुझे दही दे दो, उसी से रोटी खा लूँगा।" रात नीरव के कमरे में ही ताऊ के सोने की व्यवस्था की गई। आज नीरव के साथ बीते समय में उसके व्यवहार से ताऊ काफी विचलित थे। उन्होंने नीरव को अपने पास बैठाया- " बेटा, तुम बहुत जल्दी आक्रोशित हो जाते हो, क्या इसीलिए तुम्हारे दोस्तों ने तुम्हारा नाम पॉपकॉर्न रखा है? बेटा, गुस्सा और आक्रोश आना अच्छी बात है, पर इनका परिणाम सकारात्मक हो। तुम्हारे आक्रोश से किसी को मानसिक संताप हो-यह सही नहीं। तुम एक बच्चे के भीख मांगने पर गुस्सा हो गए। रिक्शेवालों पर बरस गए! उस बच्चे को तुम क्या देते? ज्यादा से ज्यादा 5 रुपए। उसकी नियति है- इस तरह पेट भरना या फिर बाल मजदूर बनना। तुम्हें इस तरह प्रतिक्रिया देने की क्या जरूरत थी?"
            नीरव शांति से ताऊ की बातें सुन रहा था। "बेटा, तुमने कैलाश सत्यार्थी का नाम सुना होगा! इन बाल-मजदूरों को देखकर वे बहुत क्रोधित हुए थे। उन्होंने असंख्य बच्चों को बाल मजदूरी के अभिशाप से मुक्त कराया था। जो रिक्शेवाला हमें घर तक लाया, उसकी भी मजबूरी रही होगी, तभी 40 रुपयों में तैयार हो गया। सड़क सही नहीं हो तो हादसे होने का भय बना रहता है। तुम्हें एक किस्सा बताता हूँ। गांव में हमारे मोहल्ले में सड़क पर कई गड्ढे हो गए, जिस से आए दिन कोई न कोई गिर पड़ जाता। मोहल्ले के एक नवयुवक ने अपने साथियों को एकत्र किया और सड़क की मरम्मत कर दी। मैं तुमसे यह नहीं कहता हूं-तुम यह काम करो। पर यदि उस युवक में आक्रोश नहीं आता तो उसके साथी भी नहीं बढ़ते। बेटा, गुस्सा और आक्रोश एक शक्ति है, जिससे बदलाव के रास्ते खुलते हैं। बेटा, जब रूखी रोटी नहीं खाई जाती, तो भला रूखी बोली कैसे सुहाएगी?"
             नीरव को अहसास हो गया-उसे अपने 'नीरव' नाम को सार्थक कर 'पॉपकॉर्न' नाम को झुठलाना होगा।

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