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पिता

            जया और रिया दो बेटियाँ हैं - मेरी। मैं बहुत गौरान्वित महसूस करती हूं कि दोनों बेटियां सुशील और गुणी हैं। हमारे दिए संस्कार विफल नहीं हुए। जया का विवाह हो गया। रिया की भी शिक्षा पूरी हो जाएगी। रोहन ने रिया के लिए वर देखना शुरू कर दिया है। ऐसा वर, जिसमें बेटी से ज्यादा काबिलियत हो। एक पिता की चाह है- लड़का सर्वगुणसम्पन्न हो। ऑफिस से आने के बाद घंटों कम्प्यूटर पर 'वर-तलाश-कार्यक्रम' जारी रहता, साथ ही फोनों का सिलसिला भी। मैं जानती हूं- रोहन बेटियों के प्रति हमेशा संवेदनशील रहे।
            मुझे अपने स्कूल के दिन याद हो आए। मैं संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी। माँ और दादी को कह कर अपनी बात पापा तक पहुंचाती थी। अपनों से बड़ों के सामने पापा भी मुझे प्यार करने में संकोच किया करते थे। भावनाओं को अभिव्यक्त करने में पापा हिचकिचाते थे, बड़ों का लिहाज रखते थे, पर मन के भीतर अथाह प्रेम भरा होता था। वे अपने अहसासों को जज्ब किए रहते थे। कॉलेज में मैंने दाखिला लिया तो पापा मेरे लिए 'शक्तिस्तम्भ' रहे। बंदिशों भारी हिदायतें, रूखी सी हंसी और सख्ती ओढ़े व्यवहार के पीछे उनके मन का प्रेम और चिंता ही छिपी होती थी।
            आज समय में परिवर्तन आया है। अब एक पिता दुनियावी बातों और हालातों को अलग नजरिये से देख रहे हैं। वे खुद उस कम्फर्ट जोन से बाहर आ रहे हैं, जिसमें बेटियों को एक तयशुदा परवरिश देने की हिदायत दी जाती थी। रोहन ने बेटियों को सदा हर काम में प्रोत्साहित किया। रिया को पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए दूसरे शहर भेजा। संभल कर चलने और सतत आगे बढ़ने की सीख उनकी हर बात में शामिल होती है।
            मुझे याद है- जया की बिदाई का समय। रोहन की आंखों में लालिमा छा गई थी। आंखों के आस पास के काले घेरों के बीच ये लालिमा हवन के धुएं की वजह से नहीं, बल्कि उस भारी मन के कारण थी, जो अपनी बेटी को खुद से हमेशा के लिए दूर करते समय होती है। अपने भावभीने शब्दों को होंठों पर न लाना, आंसुओं के बांध को रोककर रखना-इतना संयम एक पिता ही निभा सकता है।
            आज रिया पढ़ाई पूरी कर के लौट आई है। हम दोनों बहुत खुश है। बच्चे के घर में आते ही माहौल अलग हो जाता है। रोहन की आंखों में चमक आ गई है और होंठों पर मुस्कान। जय और रिया की आदत रही है-भोजन अपने पापा के संग उनकी थाली में ही करती है। खाना खाते खाते रिया बोल पड़ी- "पापा आपसे एक बात कहनी है।"
" कहो।"
" मेरे साथ अंकुर नाम का लड़का पढ़ता था। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं । यदि आप को भी वो पसंद हो तो.... देख लीजिएगा। इसी शहर में उनका घर है।। आप और मम्मी उनके परिवार से मिल लीजिएगा। "
            रोहन अपनी बेटी के भाव कुछ शब्दों से ही जान गए। दो दिन में रिश्ता तय हो गया। कंप्यूटर पर लड़कों की लम्बी फेहरिस्त में कोई पसंद नहीं आया और एक बार में ही बेटी की पसंद रास आ गई।
            इसीलिए कहते हैं- एक मुस्तक़िल आसरे की तसल्ली का नाम है -पिता। हर घर में पिता ऐसा हितकारी माहौल बनाए रखते हैं कि बच्चे को अपनी माँ के माध्यम से सारी सुख-सुविधाएं मिलती रहें।

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