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दरकते रिश्ते

            'काश, मेरे पंख होते और मैं उड़ पाती !' आज रीना के देहांत की खबर ने रेखा को विचलित कर दिया। रेखा के छोटे भाई अर्णव की पत्नी रीना। आज भाई को मेरी जरूरत है, पर नकुल की इजाजत के बिना पीहर जाना- अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। आज मुझे माँ और भाई के पास होना चाहिए। अर्णव के बच्चे बुआ का बाट जोहते ही होंगे ! कुछ ही दिन पहले पड़ोस की दीपा ने रीना की बीमारी के समाचार दिए थे। नकुल से जिक्र किया तो चिल्ला पड़े-'पहले अपना घर संभाल लो।' महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है, पर दरवाजे पर दस्तक दे सकने का आश्वासन हमेशा साथ होता है। अब नकुल के गुस्से के डर से रेखा मायके  के दरवाजे पर दस्तक देना तो दूर, देहरी पर पहुंचने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही है।
            हवा का एक झौंका आया, अतीत के पन्नों पर से धूल झड़ने लगी। नकुल की ऑटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट्स की फैक्टरी बढ़िया चल रही थी। अर्णव अपनी नौकरी से खुश नहीं था। नकुल ने अर्णव को अपनी फैक्टरी में लगा लिया। काम की सभी बारीकियों को समझाया। कुछ ही महीनों में अर्णव काम में पारंगत हो गया। नकुल के परामर्श से उसने निजी दुकान खोल ली। दिन रात की मेहनत और कार्य कुशलता से दुकान ने कारखाने का रूप ले लिया। व्यापार बढ़िया चलता रहा। इधर नकुल को व्यापार के सिलसिले में जापान जाना पड़ा। मैनेजर को कारोबार सौंप कर वह चला गया। जापान में इतना उलझा कि भारत लौटने में उसे दो महीने लग गए। आने पर पता चला कि उसके कई बड़े ग्राहकों ने अपने ऑर्डर वापस ले लिये। व्यापार में बहुत बड़ा घाटा हुआ। इसका कारण जानने के लिए नकुल ने जांच पड़ताल की। पता चला-दो ग्राहकों के ऑर्डर समय पर उपलब्ध न होने के कारण अन्य ग्राहकों ने भी ऑर्डर कैंसिल कर दिए। इधर अर्णव का व्यापार तरक्की करने लगा। नकुल के कई ग्राहक अर्णव के पास चले गए। इस बात की जानकारी मिलते ही नकुल ने अर्णव को फोन पर डांटा और सारी खुन्नस निकाली। अर्णव कहता रहा- " जीजाजी, मैं तो जानता ही नहीं, आपके ग्राहक कौन कौन से हैं? मेरे पास ऑर्डर आए और मैंने पूरे कर दिए।"
            आधी अधूरी बातें, चुभते शब्द और कितनी ही बार अबोला हमारे रिश्तों का दम घोंट देता है। परवाह के साथ सुलझी-सी बात करना जरा मुश्किल नहीं है। रिश्ते की प्रगाढ़ता के लिए संवाद अनिवार्य है। गलतफहमी की गाँठें  खुल सकती थी, बस जरा जतन से ! परंतु नकुल ने तो कैंची चला कर रिश्ता ही तोड़ लिया। रेखा वह दिन भूली नहीं, जब नकुल घर में घुसते ही अर्णव को भद्दी गालियां दे रहे थे। अर्णव ने बहुत कोशिश की नकुल से बात करने की, परन्तु नकुल के मन में तो कड़वाहट भर चुकी थी और इसका हर्जाना भुगत रही थी -रेखा, एक अबूझ सी पीड़ा थी उसके भीतर। अपनी पीड़ा को सास के सामने रखी। उनका कहना था -' धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। यह लड़ाई एक व्यापारी की दूसरे व्यापारी से है, न कि जीजा की साले से।' सास के कहने पर ही कभी कभार अपनी माँ से बात कर लिया करती, पर मन के कोने में एक डर बैठा ही रहता-नकुल को पता न चल जाय। पुरुष की इच्छाओं, पसंद-नापसंद, उसकी मर्जी के मुताबिक काम करना हर स्त्री अपना अलिखित नियम बना लेती है, रेखा भी इन्हीं में एक है।
            रेखा बहुत परेशान है-क्या माँ को फोन करूँ? पर क्या बात करूँगी ? अचानक सासु माँ याद आ गईं, उन्हें फोन लगाया। रोते रोते रीना के देहांत की खबर दी। रेखा की सास सुलझे विचारों की महिला हैं- "रेखा, तुम्हें अपनी माँ और भाई के पास होना चाहिए। कुछ दिनों के लिए मायके चली जाओ। मैं और तुम्हारे पापा नकुल से बात कर लेंगे। हम भी कल तुम्हारे मायके पहुंच जाएंगे।"
            एक माँ ही बेटी के दर्द को समझ पाई। सास को फोन पर खबर देने मात्र से भीतर का तूफान शांत हो गया। रेखा को अफसोस हुआ -रीना की बीमारी की खबर सास को क्यों नहीं दी ! रीना से मिलने की इजाजत ही मिल जाती।

          

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