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निस्तब्धता

आज सूना-सूना सा है यह शहर,
भला क्यूं कर, वीरान है हर पहर।
चहुँ ओर -छोर की यह निस्तब्धता,
आभास कराती मन में पसरी व्याकुलता।

मेरे आँगन के तरु हैं मुरझाए,
 मंडरा रहे गहरे धुंधले साए।
जुनून कहूँ या पागलपन इस खामोशी को,
सुनता नहीं कोई किसी की बातों को।

अमरबेल सी लिपटी है मेरी इच्छाएँ,
राह है मुश्किल, कौन मन को समझाए।
गहन कुहासे से है पथ-अवरुद्ध,
चुनौतियां हैं अनगिनत, मैं हूँ निःशब्द।
   
नहीं रही संवेदना, मूंद गए नयन।
मुँह में है राम, हाथ में है जाम।
धर्म की आड़ में कत्ल हो रहा ईमान,
स्तब्ध है सृष्टि, कब होगा विराम।

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