खुशनुमा दौर चल रहा था, सफर का,
सबक अधूरा ही था, अभी जिंदगी का।
कैरोना ने डेरा डाल, सब कुछ हिला दिया,
आपदा के दौर ने हमें जीना सिखा दिया।
जीवन पथ चुनौती दे रहा, हर कगार पर,
अंगारों का क्या भय, जब चलना हो इसी पथ पर।
इस छुपने-छिपाने के खेल में कितने ही ढह गए,
कुछ तूफान की आहट से ही बिन बरसात बह गए।
पर्दा आंखों से हमने झूठी उम्मीदों का गिरा दिया,
झूठी लालसाओं के बंधन से खुद को मुक्त करा लिया।
हवा का रुख देख मैंने नाव के पाल को थाम लिया,
घर में रहे सिमटे, पर रिश्तों को मजबूत बना लिया।
जब दौर हो गर्दिश का, अस्तित्व है बचाना जरूरी,
जिंदगी के इस मंजर में, धीरज रखना है जरूरी !
कैसा भी रहा हो दौर, कब कहाँ है यह ठहरा?
यह समय भी नहीं रहेगा, मानो अब ही गुजरा।
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