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कर्त्तव्य की वेदी

            रागिनी सुबह से काम में जुटी है। काम है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेते! हर पल निगाह घड़ी पर जाती है। साढ़े नौ बजे घर से निकलना है। आज दोनों का नौकरी करना जरूरी हो गया है, वरना खर्चे कैसे पूरे हों? बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर में आ गए। गाँव में मां- बाबूजी। भला एक की कमाई से जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे हो?  कभी कभी रागिनी के मन में विचार आता है कि सुचिता कितनी खुशनसीब है, कुँवारी है, हमेशा अपनी कमाई खर्च करने में पूरी स्वतंत्र है। हम तो अपने परिवार के खर्चों में अपनी इच्छाएं ही दबा लेते हैं।
            रागिनी समय पर ऑफिस पहुंच गई। अरे, यह क्या? आज भी सुचिता नहीं आई। तीन दिन से सुचिता ऑफिस नहीं आ रही है। रागनी ने सुचिता को फोन किया, जवाब मिला- 'कुछ जरूरी काम है, दो दिन और नहीं आ सकूंगी।' सुचिता सदा चुटकुले छोड़ने वाली, स्मार्ट और मेहनती लड़की। फोन रखने के बाद रागिनी का मन विचलित हो गया। तीन दिन से ऑफिस में नीरसता छाई हुई है , अभी दो दिन और! रागिनी ने जरूरी काम खत्म किए और ऑफिस से सुचिता के घर का पता ले कर जल्दी ही निकल गई।
            सुचिता के घर का दरवाजा खुला ही था। दरवाजा खटखटाया तो सामने वह बर्तन मांजती हुई दिख ही गई। नजरें मिली, सुचिता ने अंदर आ कर बैठने के लिए कहा। सुचिता के आने तक रागिनी ने घर में चारों तरफ नजरें दौड़ाई। दो खटिया पर बुजुर्ग माता पिता लेते हुए थे। जमीन पर बच्चा खेल रहा था। हाथ धो कर वह आई- "रागिनी, तू यहां कैसे आई?"
"अरे, ऑफिस में तेरे बिना अच्छा नहीं लग रहा था। आज काम भी जल्दी खत्म हो गया तो सोचा तुझ से मिलती चलूं। तूने कभी जिक्र ही नहीं किया कि तेरे माता पिता साथ में रहते हैं। और यह बच्चा?" 
"हाँ, मेरी माँ गठिया मरीज हैं और पिताजी को सांस की तकलीफ है।" बच्चे को पुचकारती हुई बोली-"यह मेरा भतीजा है।"
"अच्छा तुम अपने भाई भाभी के साथ रहती हो?"
"भाई नहीं सिर्फ भाभी। भाई एक फैक्टरी में काम करते थे, फैक्टरी बन्द हो गई, उन्हें और कहीं काम मिली नहीं। एक दिन बिना बताए घर से चले गए। मैं नौकरी कर ही रही थी। भैया के जाते ही सारी जिम्मेदारी मुझे ओढ़नी पड़ी। भाभी ने स्कूल में टीचर की नौकरी ले ली। यह मेरा कान्हा भाभी के साथ स्कूल जाता है। इसे तीन दिन से बुखार है। भाभी छुट्टी नहीं ले सकती थी, तो मैं ही घर पर रुक गई। बस, इसी तरह दिन निकल रहे हैं।"
"पर सुचिता इस तरह का जीवन तो तन्हाइयों से भरा है और तन्हाइयों के साए बड़े लंबे होते हैं। अपने सपनों को स्वाहा मत होने दो।"
"रागिनी, हम ऐसे समाज में हैं, जहाँ बेटे के जन्म का आशीष हर औरत को ठूंस ठूंस कर दिया जाता है, मानो बेटे के भरोसे ही जीवन निर्वाह होगा। आज मेरी माँ से प्रश्न करूँ- 'तुम्हारा बेटा कहाँ है?' पर दोनों का दिल चोटिल हो चुका है। अपने मन को तसल्ली देने के लिए एक जुमला कहते रहते हैं-'जैसी रब की इच्छा', पर इस जुमले से मुझे चोट लगती है।"
"रागिनी, कभी कभी मन उद्दंड हो कर, मुक्त हो कर भाग जाना चाहता है। जब चारों तरफ नकारात्मक प्रवृत्तियां हों तो जीवन भी बंजर बन जाता है। कभी मेरे मन में प्रेम की अनुभूति हिलोरें ले रही थी, मैं भी किसी के हृदय का स्पंदन बनना चाहती थी। घर में किसी को बताती, उस से पहले भैय्या ने जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लिया। निबाह की मजबूरी के चलते अपना ही ख्याल छूट गया। जिंदगी मुझे उम्रदराज बना रही है। कोई चमत्कार हो, भैय्या लौट आएं, तो मैं मन के द्वार पर लगी सांकल खोल दूँ। वरना कर्त्तव्य की वेदी पर मेरे सपने स्वाहा हो रहे हैं।"
            रागिनी अचंम्भित थी। सुचिता की संवेदना, त्याग और विशालता ने उसके दिल को छू लिया। उसके हृदय में मौज और ख्वाहिशें सिमट गई हैं, वह अपने सपनों की आहुति देकर कर्तव्यों को पूर्ण कर रही है। घर का बेटा नकारा रहा, जिम्मेदारियों से भाग गया। आत्मविश्वास से लबरेज बेटी अपने कर्तव्यों को पूरा करें, कई आयामों को छू ले, तब भी क्या समाज बेटी की अहमियत देगा? यह तो सच है जिंदगी में सुकून की चाहत के लिए जरूरी है- सुचिता जैसी साहसी मित्र की सकारात्मक तरंगों से बाबस्ता रहें।

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