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आईना

सोचा, हूँ उम्रदराज, व्यर्थ है देख आईना,
सप्ताह बीते, बीते मास, केके रोज देख आईना।
खुद को न पहचान पाई, आईने को ही शत्रु पाया,
चेहरे की उभरी झुर्रियों से, खुद को कीर पाया।

करती रही चेहरे का घर्षण, परतें लगाई अनेक,
जुल्फों को दे नया रूप, आई लबों पर तबस्सुम।
बेतरतीबी ही सही, मुखमंडल खूबसूरत दिख गया,
आईना दिखा गया समय की नजाकत, खुद को अमीर पाया।

काश, हम जो चाहते, वो दिखाता आईना।
काश, दाएं को बायां न दिखाता आईना।
काश, मन पर लगी खरोंचे ही दिखा देता आईना।
काश, सूरत की जगह सीरत दिखा देता आईना।

हे प्रभु, कोई आईना ऐसा हो, 
              जो चेहरा नहीं किरदार दिखा दे।
जो चेहरों पर दिखाते मुस्कान,
               उनके दिलों का फरेब दिखा दे।

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