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मील का पत्थर

मैं मील का पत्थर हूँ,
मैं संकेत वाहक, दिशा निर्देशक हूँ।
मिट्टी से लिपटा, जमीन में आधा गड़ा,
अब भी वहीं, जहाँ कल था खड़ा।

मैं पाषाण हूँ, पर पथ-दृष्टा हूँ,
एक मंजिल तक पहुँचने का सोपान हूँ।
मुझ में गति कहाँ, पर निगाहें थम जाती हैं,
मुझे देख सबकी गति बढ़ जाती है।

मैं निर्जीव, असहाय, मूक हूँ,
खुद गुमनाम, पर लोगों का सुनिश्चित पता हूँ।
हो गया हूँ पत्थर, हर मौसम से पथराते,
देख रहा हूँ, राहगीरों को आते-जाते।

मैं खड़ा तटस्थ, एक शिला हूँ,
पर 'चलते रहो' का संदेश देता हूँ।
ऐसा भाग्य कहाँ, इस शिला से मुक्ति पा लूँ,
किसी के चरण-रज पाकर, मानव रूप जी लूँ!

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