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मेरी मंजिल

ढूंढ रही हूँ, कहाँ है मंजिल खबर नहीं,
पस्त हो चुके हैं पांव,आसान ये सफर नहीं।
कदमों ने नापा हर डगर, हर मंजर,
आंखों को नहीं दिखा कभी मील का पत्थर।

मंजिल की जुस्तजू में झोंक दिया सारा दमखम,
बेताब तमन्नाओं की कसक रही हरदम।
शिद्दत से मुकाम की चाहत ने जुटा दिया,
 कभी सुना-अंधेरों ने सबेरा होने न दिया?

न बैठूंगी आशियां में परों को समेटकर, 
अभी भी इतनी जान है खुले हैं मेरे पर।
रहेगा हौसला, खुली फिजाओं में उड़ान का,
खुद से वादा है, मंजिल तक चलते रहने का।

मेरी मंजिल-
सुकून इतना हो सुख से जिंदगी चल जाए,
दुख इतना हो कि शांति से झेल पाएं।
रिश्ते इतने गहरे हों प्यार से निभा पाएं,
मंजिल इतनी ऊँची न हो 'अपने' ओझल हो जाएं।


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