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पहचान

          पंद्रह दिन पूर्व स्निग्धा को हॉस्टल वार्डन की जिम्मेदारी मिली। एक साधारण गांव में यह स्कूल है। प्रायः साधारण, निर्धन परिवार के बच्चे ही यहाँ रहते हैं। स्निग्धा को दो रूम का क्वार्टर मिल गया। दरवाजे पर नेमप्लेट लग गई- 'स्निग्धा शर्मा, छात्रावास अधीक्षिका'। भैया जैसा रुतबा तो नहीं, पर पहचान तो मिली। घर से निकली, जब भैया भाभी नाराज थे। भाभी ने कहा था- "तुम सही गलत रास्ते समझती हो। पर घर से दूर अनजान जगह पर रहना आसान नहीं है। जब भी लगे, घर लौट आना। माँ को तुम्हारी कमी खलेगी।"
भैया बोले थे- "तुम माँ की स्थिति देख रही हो! अब इनके निजी कामों में भी सहारा देना पड़ता है। तुम्हें माँ के प्रति अपने दायित्वों का अहसास होना चाहिए। तेरी भाभी पर सारा बोझ आ जाएगा। यहाँ मिल बाँट कर सारे काम हो जाते हैं, वहाँ तुम अकेले कैसे मैनेज करोगी?"
          स्निग्धा चालीस वर्ष की हो गई है, पर भैया आज भी उसे दायित्वों का बोध करा रहे हैं, जब कि वे भूल गए- उसके प्रति भी उनका दायित्व है। जिससे स्निग्धा ने प्यार किया, उसे भैया ने दुत्कार दिया क्योंकि उसकी जाति हल्की थी। भैया ने उसे झूठे केस में फंसाने की धमकी दे दी, माँ ने भी भैया का साथ दिया और वह हमेशा के लिए शहर से दूर चला गया, फिर उससे मुलाकात हुई ही नहीं। स्निग्धा जमनाप्रसाद शर्मा, एडवोकेट की बेटी और देव प्रसाद शर्मा, एडवोकेट की बहन। कॉलेज में थी, तब पिताजी को लकवा मार गया, उनकी प्रेक्टिस बन्द हो गई। उनके सभी केस भैया की रिक्त झोली में आ गए। पिताजी पूरी तरह से पराश्रित हो गए। अब पिताजी की नेमप्लेट के बगल में बड़ी नेमप्लेट लग गई- देवप्रसाद शर्मा, एडवोकेट।। थोड़े दिन बाद पिताजी की नेमप्लेट ही हट गई। पूरी तरह से मालिकाना हक भैया भाभी ने संभाल लिया। कोठी बनानेवाले माँ पिताजी एक कमरे में सिमट कर रह गए। फिर पिताजी के जाने के बाद माँ अकेली। स्निग्धा इसी घर में जन्मी, पली। कमा भी रही थी, पर घर में अपनेपन का अहसास कभी हुआ ही नहीं। माँ का अस्तित्व ही धूमिल हो गया, फिर भला उसका अस्तित्व कैसे पनपने दिया जाता! इसी बोध से उबरने के लिए यह नौकरी कर ली। यहाँ उसे अपनी पहचान तो मिली।
          हॉस्टल में प्रवेश किया, तो कैम्पस में झाड़-झंखाड़, गंदगी, खुले-टूटे कूड़ेदान से घबराहट होने लगी। रसोई की दीवारों पर लटकते जाले, एग्जॉस्ट फैन से टपकता तेल, चारों तरफ भयावह स्थिति थी। मिसेज रस्तोगी से जब चार्ज लिया, तब स्निग्धा ने कहा- "ऐसी खराब स्थिति में बच्चे कैसे स्वस्थ रह सकते हैं?" 
मिसेज रस्तोगी ने कहा-" पैसा कम है, खर्च ज्यादा। महीने भर में पता चल जाएगा और हाँ, तुम तो कुँवारी हो। घर- गृहस्थी चलाने का अनुभव भी नहीं है। इतने सारे बच्चों को संभाल पाओगी?" मिसेज रस्तोगी के वाक्- चातुर्य वाक्यों से स्निग्धा के भीतर एक द्वंद्व शुरू हो गया। कभी आत्मविश्वास दृढ़ होता , तो कभी लड़खड़ाने लगता।
          समय ने गति पकड़ ली। धीरे- धीरे प्रशासनिक अधिकारी, अभिभावक स्निग्धा के काम से संतुष्ट रहने लगे। स्निग्धा को बच्चों की समस्या दिखने लगी। 15 अगस्त राष्ट्रीय पर्व के एक दिन पूर्व स्निग्धा ने खाना बनानेवाली राधा दीदी को बुलवाया- "कल बच्चों के लिए गुलाबजामुन बनाने हैं, खोवा कितना मँगा लें।"
राधा बोली- "मैडम जी, हमने तो कभी गुलाबजामुन नहीं बनाए हैं।"
"पिछले वर्ष तो दो बार गुलाबजामुन बने थे, रजिस्टर में तुम्हारा अंगूठा लगा है और कई बच्चों ने लिखा है- बहुत स्वादिष्ट गुलाबजामुन।"
"मैडम जी, जब भी सरपंच जी के यहाँ शुभकार्य होता, तब अगले दिन यहां मिठाई आ जाया करती। वो मैडम जी हमारा अंगूठा यह कह कर लगवा लेती कि मिठाई हम बनाए हैं।"
स्निग्धा समझ गई- सरपंचजी ने अपने घर की बासी मिठाई हल्की की और मिसेज रस्तोगी ने मिठाई का खर्चा अपने पर्स में लिया। उसे मिसेज रस्तोगी के प्रति वितृष्णा होने लगी। इन बच्चों के साथ ही छल कपट।
          चूना मंगाकर रसोई और स्टोर रूम की सफाई और पुताई कराई। इस बहाने स्टोर रूम में रखे सामानों पर निगाह भी पड़ गई। स्निग्धा ने महसूस किया- रूटीन खाना खाते-खाते बच्चे ऊब चुके हैं- यह तो इनके बचपन पर अत्याचार ही है। क्यों न, किसी बच्चे से उसकी फरमाइश जानी जाय। राधा से कहा-" जाओ, किसी बच्चे को मेरे पास ले आओ।"
राधा लौटी, सात-आठ साल के एक बच्चे का हाथ इस तरह पकड़ रखा था, मानो जबरदस्ती खींच कर लाया गया हो। बच्चा कमरे में आते ही हाथ जोड़ कर रोने लगा, चिल्लाने लगा-" मैडम जी, मैंने कुछ नहीं किया, मुझे छोड़ दो।"
स्निग्धा ने पास आ कर पुचकारा-" नहीं, बेटा, तुमने कुछ नहीं किया। तुम्हारा नाम क्या है?"
"सुरेश"
"सुरेश, तुम्हें मीठा पसन्द है?"
"हाँ"।"
स्निग्धा ने अपने पर्स में रखी एक चॉकलेट सुरेश को पकड़ा दी। बच्चा चॉकलेट मुँह में डाल कर मुस्कराता हुआ चला गया। राधा बोली-" वो मैडम जी इन बच्चों को जरा जरा सी गलती पर बहुत मारती थी, कई बार खाना भी नहीं देती थी। स्निग्धा मिसेज रस्तोगी के क्रूर व्यवहार से कराह उठी। स्निग्धा ने महसूस किया- बच्चों के साथ बच्चे बन जाएं तो बातचीत के दौरान बच्चे अपने भीतर छुपे डर, असुरक्षा, इच्छाएं, सपने, अनकहे पहलू को उजागर कर देते हैं। स्निग्धा ने बच्चों की ही कमेटी बनाकर सारे काम उन्हीं से सुव्यवस्थित कराए। प्रार्थना कक्ष, लाइब्रेरी, खेलकूद, बागवानी सभी कुछ बच्चे ही संभालने लगे। सुरेश छोटा ही था, पर हर काम में सहयोग देने की कोशिश करता- स्निग्धा उसके प्रयास को देख मुस्कराती रहती। 
          एक दिन प्रार्थना कक्ष में स्निग्धा ने बच्चों से कहा- "यहाँ एक टोकरी है, सभी बच्चे अपनी पर्ची पर अपनी पसंद का खाना लिख कर टोकरी में डाल दे। रोज दो पर्चियां उठाई जाएंगी, वही खाना बनेगा।" पर्चियों से टोकरी भर गई। पर्चियों पर लिखा हर व्यंजन बच्चों के बचपन के मिठास का प्रतीक है। ये बच्चे भला कड़वाहट क्या जानें! बच्चे खुशी से आपस में गले मिलने लगे। तालियाँ बजाने लगे। अब हलवा, पूरी, खीर, पकौड़ी, कचौड़ी, चॉकलेट- बच्चों को सभी कुछ मिलने लगा। 
          सरपंच जी की बिटिया का ब्याह है। स्निग्धा को निमंत्रण पत्र मिला, वह गई भी। अगले दिन कार में कई टोकरियों, बाल्टियों में खाना आया। ड्राइवर स्निग्धा से बोला-" मैडम जी, यह खाना बच्चों में बटवां देना।" स्निग्धा समझ गई- कल शादी के बाद बचा हुआ भोजन आज भेज दिया। स्निग्धा ने भोजन लेने से इंकार कर दिया। सरपंचजी को यह बात अपमानजनक लगी। यह इंसानी प्रवृत्ति है- कोई भी गलत काम हम बार बार करते रहें, तो वह गलत नहीं लगती है, जब तक कि कोई अहसास न कराए कि आप यह काम गलत कर रहे हो। कुछ ही देर में सरपंच जी कुछ लोगों के साथ स्कूल पहुंच गए। बोले- " मैडम जी, आपने भोजन लौटाकर हमारा अपमान किया है।"
"सरपंचजी, ये बच्चे भिखारी नहीं हैं। आपके ढोरखाने के जानवर भी नहीं हैं। आपको इन्हें भोजन कराना ही था, तो कल ब्याह में ही बुला लेते। बासी सब्जी, सूखी पूरियां खिलाकर इन्हें बीमार करना है क्या? ये बच्चे हमारे गाँव का गौरव हैं, भविष्य हैं। आप इन्हें खैरात न दें। यदि सहयोग देना चाहते हो, तो अच्छी पुस्तकें, खिलौनें आदि ला कर दें। थोड़े ही दिन में गाँव के प्रतिष्ठित लोगों, सरपंच द्वारा कैंपस में झूले लग गए। कैरम बोर्ड आ गया। हॉस्टल में काफी सुधार हुए। दबे और सहमे हुए बच्चे अब खुलकर, स्वछंद होकर अपनी बात स्निग्धा के सामने रखने लगे। लकड़ी का लठ्ठा पानी में तभी तक डूबा रहता है, जब तक कि उसकी पीठ पर भारी पत्थर न बंधा हो। यदि उस वजन को उतार दिया जाय, तो छुटकारा पाते ही नदी की लहरों पर तैरने लगता है, भवरों को पार करता हुए दनदनाता हुआ आगे बढ़ता है। इसी तरह बच्चे बहुत उत्साहित रहने लगे। 
          समय चक्र घूमता रहा। वार्षिक परीक्षा समाप्त हो गई। ग्रीष्मावकाश प्रारंभ हो गया। बच्चों के अभिभावक आ गए और सभी बच्चे जा चुके हैं। दो दिन से सुरेश बुखार से ग्रस्त है। उसके घर से उसे लेने कोई नहीं आया। स्निग्धा ने रजिस्टर में देखा- सुरेश के माता पिता के नाम के आगे स्वर्गीय लिखा है। अभिभावक का नाम लिखा है- सावित्री देवी, बुआ। जब तक सुरेश को उसकी बुआ ले नहीं जाती, तब तक स्निग्धा अपने घर जा नहीं सकती। इधर भैया, भाभी के पत्र आ रहे हैं- ' तुम्हारा इंतजार है।' दो दिन बाद सुरेश की तबियत ठीक थी। स्निग्धा सुरेश को लेकर सुरेश की बुआ के घर पहुंच गई। घर का हर कोना निर्धनता जाहिर कर रहा था। एक महिला बीमार अवस्था में चारपाई पर लेटी थी। सुरेश को देखते ही बोली- "बचुआ, तू आ गया!" 
"हाँ, बुआ, आप बीमार हो?"
"हाँ, कई दिन से बुखार है, तभी तुझे लिवा नहीं पाई। आप सुरेश की मैडम हो? माफी चाहूंगी आपको परेशानी हुई।" 
"जी, कोई बात नहीं, आपसे मुलाकात हो गई। क्या हुआ था- सुरेश के माता पिता को? "
"जी, रोड एक्सीडेंट में दोनों गुजर गए।"
"आपने सुरेश को हॉस्टल में क्यों डाला? "
"क्या करती, इसके जीवन से माँ-बाप का एक साथ जाना- इसे असामान्य बना गया था। मैंने सोचा- वहाँ सभी बच्चे माँ- बाप को छोड़कर रहते हैं, यह जल्दी ही नॉर्मल हो जाएगा और हो भी गया। इसके नाम बैंक में थोड़े रुपए थे, वे ही काम आ गए। वरना हमारी स्थिति...।"
"अगर आपको एतराज न हो तो मैं सुरेश का दायित्व हमेशा के लिए लेना चाहती हूँ। देखिए, मैंने शादी नहीं की और आगे कोई इरादा भी नहीं है। साल भर से इस बच्चे से मुझे काफी लगाव हो गया है। आपकी इजाजत से हम दोनों के जीवन को सम्बल मिल जाएगा। आप हमेशा सुरेश की बुआ रहेंगी।"
स्निग्धा के कहते ही सुरेश स्निग्धा से लिपट गया। दो दिन में कानूनी कार्रवाही द्वारा सुरेश स्निग्धा का पुत्र बन गया। स्निग्धा ने कहा-" सुरेश, इन छुट्टियों में हम नई जगह घूमने जाएंगे।" और भैया भाभी को पत्र लिख दिया- 'इस बार ग्रीष्मावकाश में नहीं आ सकूंगी, क्षमा करें।'
स्निग्धा घर से निकली थी, एक पहचान पाने के लिए, अब तो दो पहचान पा गई।

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