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तीर्थयात्रा

                                    सारी तैयारी हो चुकी है | सुनील और रवीना कल यात्रा के लिए रवाना हो जायेंगे | इनके हमउम्रों का ग्रुप चारों धाम की तीर्थ यात्रा सुनियोजित कर चुका है | मौक़ा अच्छा है - ये दोनों भी शामिल हो रहे हैं | हर वर्ष कुछ दिनों के लिए अपने गाँव के पुश्तैनी घर रह आते थे | माँ और पिताजी वहीँ रहते हैं | गाँव में पड़ोस के परिवार काफी मिलनसार और सहयोगी हैं - सो उन दोनों को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है | इस बार रवीना ने तय कर ही लिया था कि गाँव नहीं  जायेंगे , छुट्टियाँ कहीं और बिताएंगे |
                                     रात में सुनील सूटकेस बंद कर ही रहा था , उसके मोबाइल पर घंटी बजी | दूसरी तरफ सुनील के पिता ही थे- " बेटे सुनील , तुम्हारी माँ की तबियत अचानक बिगड़ गई है | मैं अस्पताल ले कर आ गया हूँ | तुम दोनों भी तुरंत आ जाओ | "
" पर पिताजी , हमारी तो तीरथ की टिकटें करी हुई हैं  , | आप कुछ दिन संभाल लेते तो .......| बुकिंग के सारे पैसे बर्बाद हो जायेंगे | "
 पिता ने फ़ोन रख दिया , सोचने लगे -' सुनील इतना संवेदना शून्य कैसे हो गया ? आज जीवन शैली और प्राथमिकताओं में अंतर आ गया है | माँ के प्रति जिम्मेदारी से हट कर तीर्थ ? भगवान् तो दिखते नहीं  हैं , पर माँ - बाप तो दिखते है |'
                                        इलाज शुरू हो गया | पड़ोस के साथी ही मददगार हुए | सुनील की माँ बार -बार सुनील और रवीना के  लिए पूछती रहती , पर पिता टालते रहे | इस तरह चार दिन निकल गए | बुजुर्गों की अनदेखी उनके मानसिक अवसाद की वजह बन जाती है | आखिर बेटे - बहू से मिलने की अधूरी आस लिए सुनील की माँ का देहांत हो गया |
                                         सुनील के पिता ने सुनील को फोन लगाया - " बेटा , कहाँ हो ? "
" पिताजी हम रामेश्वरम में हैं | बहुत अच्छे दर्शन हुए , बड़ा आनंद आ गया | "
" अच्छा बेटा , तुम वापसी में ' गया ' भी हो आना | तुम दोनों की बाट जोहते हुए तुम्हारी माँ चल बसी | गया में उसका पिंडदान कर आना | फिर तुम्हें समय मिले  ना मिले ! "
                                           तुरंत सुनील को बचपन में पढ़ी हुई ' श्रवण की कहानी याद हो आई , जिसने अपने निर्बल माता - पिता को तराजू में बैठाकर कन्धों पर लाद कर तीर्थ यात्रा कराई थी |

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