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स्मृतियाँ

स्मृतियाँ की मंजूषा में हैं मोती  अनगिनत,
मोती टूटे नहीं , छूटे नहीं |
अम्मा के मुकलावे का वो पीढा ,
बाबा की चांदी के मूठ वाली छड़ी |
माँ के हाथ की जाकेट ,
पिताजी का प्यार भरा आशीष |
मजबूत शख्सियतों की बोलती निशानियाँ हैं ,
नहीं खोना चाहती उनके होने का आभास |
आज भी यादों में कैद हैं हर लहमे ,
वे सिर पर हाथ रखते तो लगता ,
आसमान ने साया कर दिया |
बिखरती सदा दुआओं की महक ,
साथ छूट गए , यादों के हिस्से बन गए |
मैंने क्या हासिल किया ?
दिन रात क्या बटोरती रही ?
-जो विरासत छोड़ जाऊँगी !

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