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स्वार्थ

' सीमा , उठ बेटा , 6 बज गए | मैं जा रही हूँ | तेरे पापा के लिए काढ़ा बना दिया है | दवाई सिरहाने रखी है | खाना भी तैयार कर दिया है | दोपहर कम्प्यूटर क्लास में जाने से पहले भैया और पापा को खाना खिला देना | चल , गेट बंद कर ले | '- कहते - कहते इंदु घर से निकल गई | तड़के उठकर घर के सारे काम करना इंदु की आदत हो गयी है | रोज घर से निकलकर मंदिर जाती | भगवान् से प्रार्थना करती - ' बड़ी बहूजी का स्वास्थ्य सदा इसी तरह बना रहे ,उनकी उम्र लम्बी हो ताकि उनकी सेवा से मेरा परिवार पलता रहे |' दो वर्ष पूर्व सेठ जी का देहान्त हो गया था | देहांत से पूर्व सेठजी सारी संपत्ति अपनी पत्नी अर्थात् बड़ी बहूजी के नाम कर गए | साल भर से बड़ी बहूजी अस्वस्थ ही हैं | दो बेटों का परिवार है , लम्बा चौड़ा व्यवसाय है , बड़ी कोठी है | बड़ी बहूजी का कमरा भी सुविधा संपन्न है | वसीयत के अनुसार जब तक वे जिन्दा हैं , मालिकाना हक उन्ही का रहेगा | घर में सभी में प्रेम है , पर बड़े घर में दूर - दूर कमरों में बनी निजता से निहित प्रेम कम ही उजागर हो पाता है | साल भर से इंदु सुबह सात बजे बड़ी बहूजी की सेवा में हाजिर हो जाती और रात 9 बजे उनके सोने के बाद अपने घर लौट जाती | चार महीने पूर्व तक इंदु का पति राजेश टैक्सी चलाकर घर का भरण - पोषण कर रहा था | पर एक एक्सीडेंट ने जीवन ही पलट दिया |राजेश एक टांग गँवा बैठा | अभी भी घाव हरा है | अब सारी जिम्मेदारी इंदु पर ही आ गई है | 12 हजार की तनख्वाह से दोनों ब च्चों की पढ़ाई , राजेश की दवा , घर के खर्चे ,सभी सुचारू रूप से चल रहे हैं | बड़ी बहूजी से मिलने वालों का आना जाना लगा रहता है , उसी अनुसार इंदु के पहनावे में भी अंतर आ गया है | इंदु से संपर्क बना रहे इस लिए बड़े घर ने हाथ में मोबाइल थमा दिया | कहते हैं - बड़े बर्तन की खुरचन भी ज्यादा होती है | बदलते फैशन के साथ बड़े घर के लोगों के ब्रान्डेड कपड़े भी जल्दी पुराने हो जाते हैं | उन्हें वे सहेजने नहीं पड़ते , और इंदु को हाथ फैलाना नहीं पड़ता | प्रायः रसोई में तरकारी, मिठाई ज्यादा बन ही जाती -बचा हुआ पकवान बड़ी भाभी इंदु को दे देती | बच्चे स्वादिष्ट भोजन का स्वाद भी चख लेते | आज इंदु कुछ उदास है , अन्यमनस्क है | रात भर राजेश दर्द में कराहता रहा , सो नहीं पाया | सुबह बड़े घर बड़ी भाभी को फोन पर सूचित कर दिया -' आज मैं आ नहीं सकूंगी , राजेश की तबियत ठीक नहीं है |' उस समय तो भाभी ने बात सुनकर फोन रख दिया , पर कुछ ही देर में बड़े भैया का फोन आ गया - ' इंदु , थोड़ी देर में डॉक्टर पहुँच जाएगा | वो राजेश की पूरी जांच कर लेगा , दवा भी दे देगा | इसके बाद तुम अम्मा के पास आ जाना |' बच्चों के भरोसे राजेश को छोड़कर इंदु बड़ी बहूजी की सेवा में आ गयी | एक घंटे बाद डॉक्टर बड़े घर आ कर बता गया - ' ठण्ड में दर्द बढ़ ही जाता है और अभी घाव भरा भी नहीं , इंजेक्शन लगा दिया है |' इंदु समझ नहीं पा रही है -' यह बड़े घर का मुझ पर उपकार है या स्वार्थ ? स्वार्थ तो मेरा ही है | क्या राजेश का इलाज में अपने दम पर करा पाती ? ' शारीरिक अशक्तता से पनपी पर-निर्भरता ने बड़ी बहूजी को चिडचिडा बना दिया है | कभी कभी परेशान हो कर इंदु भी भनभन करती | पर दुसरे ही पल यह सोच चुप हो जाती - ' नौकरी गयी तो गुजारा कैसे होगा ? ' कैसी विचित्र बात है - बड़ी बहूजी का इसी तरह सेवा करवाते रहना - इंदु के मन में अपने सुख की चाह ही तो है | वे पूरी तरह से इंदु पर निर्भर हैं . पर इंदु भी तो उन्हीं पर निर्भर है , वह ही नहीं , उसका पूरा परिवार ही उन पर निर्भर है |

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4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

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लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ