यह कैसी फैली दूर तक तन्हाई .
निःशब्द खामोशी क्यों है छाई ?
गहरे सन्नाटे से मैं हूँ डरती ,
पदचाप सुनने को बैचेन रहती |
यह बहती पवन, पत्तों की सरसराहट ,
किसी प्रतीक्षा में चौकन्ना कर देती आहट |
माँ, तेरे पदचापों को हूँ जान गई ,
तेरे आने से बालपनी सुख पा गई |
मेरे कानों को दे देती दस्तक,तेरे मन की बात ,
क्या तेरे मेरे बीच है कोई अदृश्य तार ?
अपने आँचल में है तूने मुझे छिपाया ,
तपती धूप में है तू प्यार की पावन माया |
ये पतझड़ में बहार है कैसे आई ?
मेरे बच्चे के आने की आहट दी सुनाई |
जिंदगी में मैंने जानी मोह, ममता की माया ,
तेरे नटखट सवालों ने मुझे नया पाठ सिखाया |
मनमोहक , निश्छल मीठी है तेरी पहचान ,
उदासी में आशा का संचार है तेरी मुस्कान |
दरवाजे की चौखट पर तकती ये दो आँखें ,
'उन' की आने की आहट देते ये हवा के झोंके |
ए प्रिय , एक उम्मीद -तेरे पदचाप ले कर आती है |
जज्बातों का अहसास दिला देती है |
मनुहार , तकरार , परवाह ,सभी है इस बंधन में ,
एक सजीला-सा विश्वास, मानो कोई है पास में |
आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है | मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...
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