यह कैसी फैली दूर तक तन्हाई .
निःशब्द खामोशी क्यों है छाई ?
गहरे सन्नाटे से मैं हूँ डरती ,
पदचाप सुनने को बैचेन रहती |
यह बहती पवन, पत्तों की सरसराहट ,
किसी प्रतीक्षा में चौकन्ना कर देती आहट |
माँ, तेरे पदचापों को हूँ जान गई ,
तेरे आने से बालपनी सुख पा गई |
मेरे कानों को दे देती दस्तक,तेरे मन की बात ,
क्या तेरे मेरे बीच है कोई अदृश्य तार ?
अपने आँचल में है तूने मुझे छिपाया ,
तपती धूप में है तू प्यार की पावन माया |
ये पतझड़ में बहार है कैसे आई ?
मेरे बच्चे के आने की आहट दी सुनाई |
जिंदगी में मैंने जानी मोह, ममता की माया ,
तेरे नटखट सवालों ने मुझे नया पाठ सिखाया |
मनमोहक , निश्छल मीठी है तेरी पहचान ,
उदासी में आशा का संचार है तेरी मुस्कान |
दरवाजे की चौखट पर तकती ये दो आँखें ,
'उन' की आने की आहट देते ये हवा के झोंके |
ए प्रिय , एक उम्मीद -तेरे पदचाप ले कर आती है |
जज्बातों का अहसास दिला देती है |
मनुहार , तकरार , परवाह ,सभी है इस बंधन में ,
एक सजीला-सा विश्वास, मानो कोई है पास में |
अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव मालूम पड़ गए | 1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...
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