यह कैसी फैली दूर तक तन्हाई .
निःशब्द खामोशी क्यों है छाई ?
गहरे सन्नाटे से मैं हूँ डरती ,
पदचाप सुनने को बैचेन रहती |
यह बहती पवन, पत्तों की सरसराहट ,
किसी प्रतीक्षा में चौकन्ना कर देती आहट |
माँ, तेरे पदचापों को हूँ जान गई ,
तेरे आने से बालपनी सुख पा गई |
मेरे कानों को दे देती दस्तक,तेरे मन की बात ,
क्या तेरे मेरे बीच है कोई अदृश्य तार ?
अपने आँचल में है तूने मुझे छिपाया ,
तपती धूप में है तू प्यार की पावन माया |
ये पतझड़ में बहार है कैसे आई ?
मेरे बच्चे के आने की आहट दी सुनाई |
जिंदगी में मैंने जानी मोह, ममता की माया ,
तेरे नटखट सवालों ने मुझे नया पाठ सिखाया |
मनमोहक , निश्छल मीठी है तेरी पहचान ,
उदासी में आशा का संचार है तेरी मुस्कान |
दरवाजे की चौखट पर तकती ये दो आँखें ,
'उन' की आने की आहट देते ये हवा के झोंके |
ए प्रिय , एक उम्मीद -तेरे पदचाप ले कर आती है |
जज्बातों का अहसास दिला देती है |
मनुहार , तकरार , परवाह ,सभी है इस बंधन में ,
एक सजीला-सा विश्वास, मानो कोई है पास में |
चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|' कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है | मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...
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