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पदचाप

यह कैसी फैली दूर तक तन्हाई . निःशब्द खामोशी क्यों है छाई ? गहरे सन्नाटे से मैं हूँ डरती , पदचाप सुनने को बैचेन रहती | यह बहती पवन, पत्तों की सरसराहट , किसी प्रतीक्षा में चौकन्ना कर देती आहट | माँ, तेरे पदचापों को हूँ जान गई , तेरे आने से बालपनी सुख पा गई | मेरे कानों को दे देती दस्तक,तेरे मन की बात , क्या तेरे मेरे बीच है कोई अदृश्य तार ? अपने आँचल में है तूने मुझे छिपाया , तपती धूप में है तू प्यार की पावन माया | ये पतझड़ में बहार है कैसे आई ? मेरे बच्चे के आने की आहट दी सुनाई | जिंदगी में मैंने जानी मोह, ममता की माया , तेरे नटखट सवालों ने मुझे नया पाठ सिखाया | मनमोहक , निश्छल मीठी है तेरी पहचान , उदासी में आशा का संचार है तेरी मुस्कान | दरवाजे की चौखट पर तकती ये दो आँखें , 'उन' की आने की आहट देते ये हवा के झोंके | ए प्रिय , एक उम्मीद -तेरे पदचाप ले कर आती है | जज्बातों का अहसास दिला देती है | मनुहार , तकरार , परवाह ,सभी है इस बंधन में , एक सजीला-सा विश्वास, मानो कोई है पास में |

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4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ