Skip to main content

दान

जनवरी महीना है , जोरों की मावठ पड़ रही है | बर्फीली हवा सुई सी चुभ रही है | दोपहर की धूप में बैठना अच्छा ही लगता है | यूँ कहें - ११ बजे घर का सारा काम करके महिलाओं को धूप में बैठ कर गप्पें मारने का बड़ा इन्तजार रहता है | घर के बाहर कई खटिया पड़ी हैं | कोई पालक-मेथी संवारती , कोई मटर छीलती, तो कोई बुनाई करती | इन सब के बीच बैठ जाती काकी | आज भी एक - एक करके सभी अपने अपने घरों से आ गई | काकी तो धूप निकलते से ही बैठ गई | काकी के धोंक देकर सब अपने अपने काम ले कर बैठ गई | जमघट पूरा जम गया | काकी बोली -' बिनणीयों , इब के संक्रात पे तेरुंडा में के करोगा ? सावित्री , तू के चीज को दान करेगी ?" " काकी , पहल के साल तकिया का गिलाफ करी थी , अब के 14 चादरां करुँगी |" " सुमन , तू ? " " काकी, मैं पहल के साल 14 किलो गुड़ करी थी , इब के 14 नारियल करश्युं |" " चंपा , तू ?" " काकी , हाल तो सोची कोनी !" " रामारी , कद सोचेगी , दो दिन रहगा है संक्रात का | तने बेरो है संक्रात में जी चीज को दान करा हां , वो आगला जनम में भरपूर मिले | मीना , तू के सोचरी है ?" " काकी , मैं तो संक्रात के दिन रूपया काडू हूँ | दूसरा त्यौहारां पर , टाबरा के जनमदिन पर थोडा-थोडा रूपया काड दूँ | रुपया ने भेला कर के कोई आश्रम में या जरूरतमंद ने जरुरत को सामन दे दूँ |" नई पीढ़ी की बहू के विचारों ने काकी को हिला दिया | उनके दिमाग में तूफान उठ गया -' संक्रात के नाम पर होने वाला दान सदा चर्चा का विषय ही रहता है | औरतों के प्रपंच , हैसियत , नीयत , वस्तु के गुण- दोषों की फुसफुसाहट कानों में पड़ती ही रहती है | परसों ही अपने बेटे से कह कर 14 साड़ियाँ मंगाई | साढ़े पांच हजार रुपये खर्च हुए | ये साड़ियाँ 10-15 दिन में जितनी बटेंगी , बंट जाएंगी , फिर कई दिन तक पड़ी रहेंगी | कुछ दिन पहले चौका बर्तन करने वाली सीता बता रही थी , उसकी बहन की पांच साल का बच्चा निमोनिया से पीड़ित था , पैसों की कमी से इलाज पूरा न हो पाया और बच्चा मर गया |' काकी ने जो बातें कभी सोची नहीं , वही बातें आज सोचने को मजबूर हो गई कि दीनहीन , सामर्थ्यविहीन की मदद करना , भूखे की भूख मिटाना ही संक्रांति का अभय दान है |

Comments

Popular posts from this blog

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ