अब खुल गए हैं पंख मेरे ,
अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें |
चाहतों की उड़ान भरता बावला मन ,
धुंध के परे खुला आसमान |
जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत ,
उल्हानें नहीं करते अब आहत|
चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला ,
क्यों न आए चेहरे पर नूर भला |
चाँदनी छा गई है बालों में ,
तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में |
अहसासों और जज्बातों के रेले ,
खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले |
कमी नहीं है भौतिक सुखों की ,
कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की |
मोबाइल पर कुछ पल बात कर ,
खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर |
'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ ,
मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ |
अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ ,
पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ |
प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ ,
ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ |
बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो ,
जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?
चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|' कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है | मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...
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