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खुले पंख

अब खुल गए हैं पंख मेरे , अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें | चाहतों की उड़ान भरता बावला मन , धुंध के परे खुला आसमान | जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत , उल्हानें नहीं करते अब आहत| चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला , क्यों न आए चेहरे पर नूर भला | चाँदनी छा गई है बालों में , तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में | अहसासों और जज्बातों के रेले , खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले | कमी नहीं है भौतिक सुखों की , कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की | मोबाइल पर कुछ पल बात कर , खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर | 'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ , मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ | अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ , पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ | प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ , ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ | बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो , जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?

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बोनसाई

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4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

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चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...