Skip to main content

खुले पंख

अब खुल गए हैं पंख मेरे , अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें | चाहतों की उड़ान भरता बावला मन , धुंध के परे खुला आसमान | जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत , उल्हानें नहीं करते अब आहत| चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला , क्यों न आए चेहरे पर नूर भला | चाँदनी छा गई है बालों में , तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में | अहसासों और जज्बातों के रेले , खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले | कमी नहीं है भौतिक सुखों की , कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की | मोबाइल पर कुछ पल बात कर , खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर | 'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ , मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ | अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ , पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ | प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ , ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ | बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो , जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?

Comments

Popular posts from this blog

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...