अब खुल गए हैं पंख मेरे ,
अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें |
चाहतों की उड़ान भरता बावला मन ,
धुंध के परे खुला आसमान |
जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत ,
उल्हानें नहीं करते अब आहत|
चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला ,
क्यों न आए चेहरे पर नूर भला |
चाँदनी छा गई है बालों में ,
तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में |
अहसासों और जज्बातों के रेले ,
खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले |
कमी नहीं है भौतिक सुखों की ,
कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की |
मोबाइल पर कुछ पल बात कर ,
खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर |
'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ ,
मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ |
अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ ,
पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ |
प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ ,
ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ |
बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो ,
जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?
आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है | मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...
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