जरूरत नहीं उम्र को ढंक दूँ खिजाब से,
रिश्तों की गहराई नापी है मैंने उम्र से।
किसी प्याले की कुव्वत कहाँ बहका सके मुझे,
धुन है, जज्बा है-प्यार का,जिसने बाँधा मुझे।
क्यों कर गुजारें जवानी मयखानों में,
खो देते होश-हवास, जब डूब जाते नशे में।
परिवार तबाह करता यह जुए का नशा,
दीवानगी दिखाती दौलत,शोहरत का नशा।
नशा है स्मार्टफोन पर जुटे रहने का,
नशा है घंटों बतियाते रहने का ।
नशा है लोगों के लाइक्स देख हर्षाने का ,
नशा है चेटिंग का , फ्लेर्टिंग का।
रिश्ते का जुनून हो नशा हो प्यार में,
धन-मन समर्पित हो , ऐसा नशा हो संसार में,
मंदिर-मस्जिद,धर्म-जात के नाम पे न लड़े इंसान,
ढोंगी बाबा और नेताओं बंद करो देना अपना ज्ञान।
चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|' कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है | मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...
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