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अमरूदों वाला मकान

          देखते ही देखते चित्रों में बड़ा अंतर आ गया है। मेरा आठ वर्षीय पोता प्रकृति का चित्र बना रहा है। जिसने प्रकृति के दृश्य तो नाम मात्र चित्रित किये हैं। घर के आगे कार, दोपहिया वाहन बना दिए, कुछ गमले खड़े कर दिए, आसमान में उड़ता हवाई जहाज बना दिया और आसपास मकानों के जमघट। मुझे अपने दिन याद हो आए। मैं प्रकृति का चित्र बनाता था- घर, चौबारा, अमरूद का पेड़, बावड़ी, नदी, दो लकीरों से पहाड़ और उस पर झाँकता हुआ लाल सूर्य, रुई जैसे गोल-गोल बादल, पक्षियों के साथ मोर भी बना देता था। मेरे दोनों बेटों की चित्रकला भी अच्छी ही थी। वे प्रकृति का दृश्य अलग ही बनाते थे। उनकी तस्वीर में खेत घट गए, घरों के आगे रास्ते बन गए, नदी थोड़ी दुबली हो गई, पेड़ कम हो गए। आकाश में पक्षी भी प्रतीकात्मक रूप में ही उड़ते दिखाई दिए। आज पोते की चित्रकला देख कर यह तो सत्य हो गया कि जो चीजें आसपास ही न हों, वे ख्यालों से भी दूर होती जाती हैं, उनका चित्र भी बनाना मुश्किल होता है। गेँहू, ईख के खेत, नदी, बावड़ी-यह पीढ़ी क्या जाने ?
          हमारा मकान दादाजी ने बनवाया था। घर के बाहर अमरूद का एक बड़ा पेड़ था। यह पेड़ बारह महीने फल देता था और फल भी मीठे। राह आते जाते सभी सड़क की ओर झुकी डाली से एकाध अमरूद खा ही लेते थे। हमारा घर 'अमरूदों वाला मकान' कहलाने लगा। घर को एक नई पहचान मिली। घर ढूंढने में किसी को परेशानी नहीं होती। पता बहुत साफ और स्पष्ट बन गया-'अमुक मोहल्ले में अमरूदों वाला मकान '। बस, इतने भर से अनजान व्यक्ति भी बिना परेशानी के घर पहुंच जाता। पेड़ पर तोते और पक्षियों का वास सदा रहता। पेड़ के नीचे छोटे-छोटे पौधे स्फुटित होने लगे तो दादाजी ने उन्हें उस पेड़ के अगल बगल में रोप दिए। पुराना पेड़ उम्रदराज हो कर गिर भी जाता तो दूसरे पेड़ फल देने के लिए तैयार मिलते। मैं  नियम से रोज अमरूद के दो पत्ते चबा लिया करता। घर के बाहर खड़ा अमरूद का पेड़ हमारे घर-परिवार का ही हिस्सा है-यह हम ने उस दिन जाना, जिस दिन दादाजी परलोक सिधार गए।  लोग कह रहे थे-" वो अमरूदों वाले दादाजी नहीं रहे।" किसी ने कहा-" वो अमरूदों वाली आंटी हैं ना, उनके ससुरजी शांत हो गए।" अहसास हुआ कि अमरूद का पेड़ हमारे घर का बड़ा और सम्मानित सदस्य है।
          अमरूद के 2-3 पेड़ कायम रखने की परंपरा पिताजी ने भी रखी और मैने भी। पर यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं चल पाई।। दोनो बेटे कमाने लगे। दोनों बहुएँ नौकरीपेशा आ गई। सारी कवायदों में कार , स्कूटर जरूरी सामानों की फेहरिस्त में आ गए । इन्हें सुरक्षित खड़ा करने के लिए जगह तलाशी गई। सभी की निगाह अमरूद के पेड़ों पर टिक गई। दो दिन में मैदान साफ हो गया। मैं कई दिन मायूस रहा, मानो कोई मेरा अपना मुझ से बिछुड़ गया। बच्चों ने मेरी भावनाओं को समझा। एक बड़े गमले में अमरूद का पौधा लगा दिया- 'बोनसाई' । तब्दीली या उसके लिए की गई कोशिश की मैने सराहना की। पर एक कसक तो रही-आंगन की शोभा पाने वाला वृक्ष जब कुछ फीट में समा दिया जाता है, तो ड्राइंग रूम की सजावट की वस्तु मात्र रहा जाता है।
          मैं इस बोनसाई के सामने स्वयं को बौना महसूस कर रहा हूँ। अब रास्ता पूछने वालों को बताने वाली पहचान नहीं बची। अमरूद, आम का पेड़ क्या गिनें, गुलमोहर तक का साया किसी घर पर नहीं दिखता!

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