घर के द्वार पर आज पुनः तुम भिक्षुक बने खड़े हो। कल भी तुम आए थे। दरवाजे को जरा सा खोलते ही मैंने तुम्हें देखा, तुरंत दरवाजा बंद कर लिया था और चिल्ला पड़ी थी -' यहां से चले जाओ। ' तुम दरवाजा पीटते रहे-' सुमन, मैं शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ़ कर दो।' मैं स्तब्ध थी। तुम्हें द्वार पर खड़ा देख आज भी स्तब्ध हूँ। 20 वर्षों बाद तुम्हारा मेरे सामने आना-मेरी आँखों से आंसू रुक नहीं रहे।
याद हो आया वह दिन जब तुम्हारे साथ मेरी शादी हुई थी। तुम अपने परिवार के इकलौते बेटे और मैं अपने माँ-बाप की इकलौती संतान। वह दिन भी नहीं भूली-शादी के पांच वर्ष बाद जब तुम साधुओं की टोली में शामिल हो गए। मुझे बताए बिना चले गए। एक कागज का पुर्जा लिख गए-' सुमन , मुझे माफ़ कर देना। मैं गृहस्थ जीवन में बंधना नहीं चाहता।' गृहस्थ जीवन एक बंधन है, इसकी अनुभूति तुम्हें पांच वर्ष बाद हुई जब कि हमारा परिवार बढ़ चुका था-एक बिटिया हो गई। यह एक छोटा सा पुर्जा नहीं, मेरे लिए आग का गोला था। एक कागज से सारे संबंधों का पटाक्षेप ? सारे रिश्तों की धज्जियाँ उड़ गई। मुझसे कुछ कहना तुमने मुनासिब नहीं समझा! क्या अपराधबोध था ? इस पवित्र रिश्ते से तुम तो पलायन कर गए, पर मैं विमुख न हो सकी। बेटी को संभालना जो था।
तुम्हारे जाने के अगले दिन से मेरा संघर्ष का दौर शुरू हो गया। तुम्हारे बिछोह के गम में तुम्हारे माता पिता भी ज्यादा समय मेरा साथ न दे सके और चल बसे। लिजलिजाति कुत्सित दृष्टियाँ मुझे सदा घेरे रहती, मैं सदा आरोपित रहती। जमाने की भीड़ में सदा तन्हा रही, पर कमजोर कभी नहीं हुई। तुम्हारा दोस्त विक्रम मुझ से मिलने आया-"भाभी, वह तो सदा से फकीराना अंदाज और फक्कड़ मिजाज का इंसान था। हमेशा वैराग्य और मुक्ति की बातें करता था।" मैं आक्रोश में आ गई थी-"जिसे तुम फकीराना अंदाज कह रहे हो, उसे 'भगोड़ा' कहा जाना चाहिए।" इन आक्रोशों, उलाहनों और संघर्षों के बीच जीवन में कहीं कोमलता और स्निग्धता का धीमा प्रवाह भी था-माँ, पिताजी और बेटी। जीते जी माँ पिताजी जोर देते रहे-'पुनः विवाह कर लो।' पर नीड़ का निर्माण तो एक ही बार होता है-कायम रहता तो वही रह जाता! सच कहूँ, तो तुमसे शिकायत हमेशा रही, पर कभी नफरत नहीं कर सकी। मुझे जीवन के कंटीले रास्तों पर अकेला छोड़ दिया और खुद निकल पड़े मुक्ति के रास्ते पर। मुक्ति के सही मायने क्या है ?
पुनः दरवाजा खटखटाने के साथ वही बोल-" सुमन, मुझे माफ़ कर दो। मैं रास्ता भटक गया था। मैं लौटना चाहता हूँ।"
"राकेश, आज तुम दर-दर भटक कर तिरस्कृत होकर द्वार पर खड़े हो। दिग्भ्रमित होकर तुम भटक गए थे- आज लौटना चाहते हो, पर मैं भ्रमित नहीं हूँ। तुम अपने कर्त्तव्यों से पलायन कर गए और अब मोह-ग्रसित हो रहे हो। परन्तु मेरा मन विरक्त हो चुका है-मैं अपने कर्त्तव्य पूरे कर चुकी। तुम लौट ही जाओ। मेरे जीवन में तुम्हारा कोई स्थान नहीं! अब मुझे मुक्ति चाहिए!"
याद हो आया वह दिन जब तुम्हारे साथ मेरी शादी हुई थी। तुम अपने परिवार के इकलौते बेटे और मैं अपने माँ-बाप की इकलौती संतान। वह दिन भी नहीं भूली-शादी के पांच वर्ष बाद जब तुम साधुओं की टोली में शामिल हो गए। मुझे बताए बिना चले गए। एक कागज का पुर्जा लिख गए-' सुमन , मुझे माफ़ कर देना। मैं गृहस्थ जीवन में बंधना नहीं चाहता।' गृहस्थ जीवन एक बंधन है, इसकी अनुभूति तुम्हें पांच वर्ष बाद हुई जब कि हमारा परिवार बढ़ चुका था-एक बिटिया हो गई। यह एक छोटा सा पुर्जा नहीं, मेरे लिए आग का गोला था। एक कागज से सारे संबंधों का पटाक्षेप ? सारे रिश्तों की धज्जियाँ उड़ गई। मुझसे कुछ कहना तुमने मुनासिब नहीं समझा! क्या अपराधबोध था ? इस पवित्र रिश्ते से तुम तो पलायन कर गए, पर मैं विमुख न हो सकी। बेटी को संभालना जो था।
तुम्हारे जाने के अगले दिन से मेरा संघर्ष का दौर शुरू हो गया। तुम्हारे बिछोह के गम में तुम्हारे माता पिता भी ज्यादा समय मेरा साथ न दे सके और चल बसे। लिजलिजाति कुत्सित दृष्टियाँ मुझे सदा घेरे रहती, मैं सदा आरोपित रहती। जमाने की भीड़ में सदा तन्हा रही, पर कमजोर कभी नहीं हुई। तुम्हारा दोस्त विक्रम मुझ से मिलने आया-"भाभी, वह तो सदा से फकीराना अंदाज और फक्कड़ मिजाज का इंसान था। हमेशा वैराग्य और मुक्ति की बातें करता था।" मैं आक्रोश में आ गई थी-"जिसे तुम फकीराना अंदाज कह रहे हो, उसे 'भगोड़ा' कहा जाना चाहिए।" इन आक्रोशों, उलाहनों और संघर्षों के बीच जीवन में कहीं कोमलता और स्निग्धता का धीमा प्रवाह भी था-माँ, पिताजी और बेटी। जीते जी माँ पिताजी जोर देते रहे-'पुनः विवाह कर लो।' पर नीड़ का निर्माण तो एक ही बार होता है-कायम रहता तो वही रह जाता! सच कहूँ, तो तुमसे शिकायत हमेशा रही, पर कभी नफरत नहीं कर सकी। मुझे जीवन के कंटीले रास्तों पर अकेला छोड़ दिया और खुद निकल पड़े मुक्ति के रास्ते पर। मुक्ति के सही मायने क्या है ?
पुनः दरवाजा खटखटाने के साथ वही बोल-" सुमन, मुझे माफ़ कर दो। मैं रास्ता भटक गया था। मैं लौटना चाहता हूँ।"
"राकेश, आज तुम दर-दर भटक कर तिरस्कृत होकर द्वार पर खड़े हो। दिग्भ्रमित होकर तुम भटक गए थे- आज लौटना चाहते हो, पर मैं भ्रमित नहीं हूँ। तुम अपने कर्त्तव्यों से पलायन कर गए और अब मोह-ग्रसित हो रहे हो। परन्तु मेरा मन विरक्त हो चुका है-मैं अपने कर्त्तव्य पूरे कर चुकी। तुम लौट ही जाओ। मेरे जीवन में तुम्हारा कोई स्थान नहीं! अब मुझे मुक्ति चाहिए!"
Comments
Post a Comment