कल ही पड़ोसी मिश्रा जी मिल गए। मैराथन से लौटे थे। उनके जोश और जुनून के आगे मैं नतमस्तक हो गई। पूछ ही लिया- 'मिश्रा जी , आप कितने वर्ष के हो ?'
बोले-' स्वतंत्र भारत की और मेरी उम्र बराबर ही है।'
मैं मुस्करा उठी- 'बहत्तर वर्ष, वाह।'
72 वर्ष-बहुत कुछ हासिल करने के लिए एक लंबा अंतराल। हमने क्या हासिल किया? हम अंग्रेजों से 72 वर्ष पूर्व आजाद हो गए, पर क्या जातिगत भेदभाव, रिजर्वेशन, धर्म के नाम पर राजनीति, लिंग आधारित भेदभाव से हम आजाद हो पाए हैं?
15 अगस्त आ गया, सोशल मीडिया पर देशप्रेम के भावपूर्ण संदेश प्रसारित होंगे। अगस्त और जनवरी माह में ही हमारे भीतर देशप्रेम की भावना क्यों हिचकोले खाती है? देशप्रेम तो एक दायित्वबोध है। जिस तरह हमारे परिवार के लिए दायित्वबोध होता है, उसी प्रकार देश के लिए भी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हमारे भीतर यह वैचारिक समझ होनी चाहिए कि धर्म, जाति और समुदाय से परे हम भारतीय हैं । स्वतंत्रता से तात्पर्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में स्वछंदता आ जाय, तो देश के लिए घातक है। एक सभ्य गणतंत्र के विकास में स्वस्थ वैचारिक मतभेद का होना निहायत जरूरी है, बशर्ते कोई भी विचारधारा किसी के जान माल को क्षति नहीं पहुंचाती हो!
सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार दर्शाता है कि हम किस तरह के नागरिक हैं। हमें हमारे देश की कितनी फिक्र है? हर किसी से यह तो उम्मीद नहीं की जा रही कि सैनिक बनकर सीमा सुरक्षा में लग जाए या राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व करें। नागरिक की जिम्मेदारी संविधान के पन्नों से नहीं निकलती। 'मैं' और 'तुम' के भाव से निकल कर 'हम' के भाव में आना ही प्रमुख उत्तरदायित्व है। 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना के साथ देश के विकास में भागीदारी से ही देशभक्ति उजागर हो जाएगी। आखिर कारवाँ में हरेक के सहयोग की अहमियत बराबर होती है।
वरना, 15 अगस्त हो या 26 जनवरी- राष्ट्रगीत की आवाज एक यांत्रिक ध्वनि मात्र लगने लगेगी और राष्ट्रध्वज फहराना- एक वार्षिक अनुष्ठान।
बोले-' स्वतंत्र भारत की और मेरी उम्र बराबर ही है।'
मैं मुस्करा उठी- 'बहत्तर वर्ष, वाह।'
72 वर्ष-बहुत कुछ हासिल करने के लिए एक लंबा अंतराल। हमने क्या हासिल किया? हम अंग्रेजों से 72 वर्ष पूर्व आजाद हो गए, पर क्या जातिगत भेदभाव, रिजर्वेशन, धर्म के नाम पर राजनीति, लिंग आधारित भेदभाव से हम आजाद हो पाए हैं?
15 अगस्त आ गया, सोशल मीडिया पर देशप्रेम के भावपूर्ण संदेश प्रसारित होंगे। अगस्त और जनवरी माह में ही हमारे भीतर देशप्रेम की भावना क्यों हिचकोले खाती है? देशप्रेम तो एक दायित्वबोध है। जिस तरह हमारे परिवार के लिए दायित्वबोध होता है, उसी प्रकार देश के लिए भी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हमारे भीतर यह वैचारिक समझ होनी चाहिए कि धर्म, जाति और समुदाय से परे हम भारतीय हैं । स्वतंत्रता से तात्पर्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में स्वछंदता आ जाय, तो देश के लिए घातक है। एक सभ्य गणतंत्र के विकास में स्वस्थ वैचारिक मतभेद का होना निहायत जरूरी है, बशर्ते कोई भी विचारधारा किसी के जान माल को क्षति नहीं पहुंचाती हो!
सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार दर्शाता है कि हम किस तरह के नागरिक हैं। हमें हमारे देश की कितनी फिक्र है? हर किसी से यह तो उम्मीद नहीं की जा रही कि सैनिक बनकर सीमा सुरक्षा में लग जाए या राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व करें। नागरिक की जिम्मेदारी संविधान के पन्नों से नहीं निकलती। 'मैं' और 'तुम' के भाव से निकल कर 'हम' के भाव में आना ही प्रमुख उत्तरदायित्व है। 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना के साथ देश के विकास में भागीदारी से ही देशभक्ति उजागर हो जाएगी। आखिर कारवाँ में हरेक के सहयोग की अहमियत बराबर होती है।
वरना, 15 अगस्त हो या 26 जनवरी- राष्ट्रगीत की आवाज एक यांत्रिक ध्वनि मात्र लगने लगेगी और राष्ट्रध्वज फहराना- एक वार्षिक अनुष्ठान।
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