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प्रेम-पथिक

चाहती हूं, सदा बनी रहूँ प्रेम-पथिक,
बरसा दूँ प्रीत, बन प्रेम -प्रतीक।
उलाहने सुन उदास हो जाता मन मेरा,
जब सपने सजते नयनों में, खिलता दिल मेरा।

यहाँ न कोई संगी, न कोई साथी,
पथरीली राहों पर हूँ भटक जाती।
अड़चनें बढ़ाती यह कायनात, थमे मेरे कदम,
इन्हें तुच्छ मान, लक्ष्य की आस में बढ़ी हरदम।

चाहे ठोकरों से मैं हो जाऊं बेहाल,
मुश्किलें हो हजार, जिंदगी हो मुहाल।
गहरे सन्नाटे हो या हो अंधेरा, राह पर,
अकेले ही चलना होता है जीवन-पथ पर।

साथ जगत में है पल दो पल,
बस, प्यार बाँटती बढ़ती चल।
करती चल एक निर्माण नवल,
निर्बल, दीन जनों की बन जा संबल।

विश्राम कहाँ? प्रेम की डगर ली थाम,
न पूछो, मेरा नाम, मेरा गाँव, मेरा धाम।
न मैं हूँ हिन्दू , न मैं मुसलमान ,
प्रेम-पथिक हूँ-यही मेरी पहचान।

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