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बातें हैं बचपन से पचपन तक की

बातें हैं बचपन से पचपन तक की,
दिल-ओ-जेहन में बसी मीठी कड़वी यादों की।
तब से अब तक भाग रही जिंदगी यूँ हीं,
सुख का छोर मानों छूट गया कहीं।

तब वाले इतवार अब नहीं आते,
साथ बैठ अब हम नहीं बतियाते।
टी वी पर 'रामायण, महाभारत'अब नहीं आते,
छत पर एंटीना घुमाने अब नहीं जाते।

'चील उड़, घोड़ा उड़' में ठहाके लगना,
लेंस से कागज जला- बहादुर बनना।
पोसम्पा, पिठ्ठू गरम में यारों को मात देना,
'इमला' में शत प्रतिशत अव्वल आना।

चवन्नी की कुल्फियों से शहंशाह होना,
पेड़ पर चढ़ आम चुराना।
दोस्तों से नाराजगी के नाम पर कट्टी होना,
दो उंगलियाँ जोड़ दोस्ती शुरू करना।

दूध के भगौने की खुरचन में बीता बचपन,
हंसते-रोते बीत गया यह बचपन।
पड़ोसी के फोन से जुड़ा मोहल्ला,
सुख दुख का साथी था पूरा मोहल्ला।

यादों के झरोखे से पहुंची पचपन में,
बच्चा बन जाने को तड़प उठ रही मन में।
जीवन की छांह सिमट रह गई नसीब में,
खोए पल पुनः जीने की चाह रह गई ख्वाब में।

सुंदर राइटिंग खो गई कंप्यूटर में,
पत्रों का नशा हुआ काफूर ईमेल में।
जेब में दो मोबाइल, पर संवाद नहीं,
आज दोस्तों के पास घड़ी है, पर समय नहीं।

चारों ओर फैले साधन मानो मकड़ी का जाल,
चक्रव्यूह को भेदने में असमर्थ अभिमन्यु सा हाल।
लूडो, सुडोकु, कैंडी क्रश दे रहे मनोरंजन,
जीत पर बच्चों की मुस्कान दिल कर देती रोशन।

जरूरत है, लाहासिल को समझ लें,
जो हासिल है, उसे कबूल कर लें।
जीना चाहती हूँ, उन्मुक्त बिन बंधन में,
लो, लौट चली मैं पचपन से बचपन में।


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