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वीरांगना

            पुलवामा अटैक में नीरज राठौड़ शहीद हो गए। श्रीमती रेणू नीरज राठौड़ अब एक शहीद की पत्नी वीरांगना रेणू नीरज चौधरी कहलाने लगी। 15 दिन में ही जीवन अर्थहीन लगने लगा, पूरा जीवन कैसे कटेगा? विवाह को 10 वर्ष हुए। आठ वर्ष का बेटा और दो वर्ष की बेटी, घर में सास-ससुर।
            सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में लगातार शिरकत करती रेणू अब घबराने लगी है। मंचों पर तो ये नेता देशनिष्ठा से लबरेज रहते, पर कार्यक्रम निपटते ही सड़कों पर अपना अलग नजारा पेश करते। स्टेज पर वक्ताओं के मुख से पति की शहादत के प्रति सहानुभूति वाले निकले शब्द आंसुओं को रोक नहीं पाते। महिला संस्था या समाज सेवी संस्था के लोग जब ढाढस बांधते, बच्चों को पुचकारते, तो सभी शुभचिंतक और अपने से जान पड़ते। इन संस्थाओं ने रेणू को एक रॉल-मॉडल बना दिया है, उनकी परिभाषा के अनुसार पति की मौत के बावजूद वह सांसारिक तौर पर बिखरी नहीं है। देशभक्ति की लम्बी-चौड़ी तकरीरों को सुन खुद फख्र महसूस करती , पर घर में घुसते ही ऐसा जान पड़ता, मानो एक खंडहर में खड़ी है। अपनी हमउम्र  महिलाओं को परिवार के साथ देखती तो जेहन में एक द्वंद्व रह-रह कर छिड़ने लगता। बेटे के गम में टूट चुके और बाबा आदम के दौर के उसूलों पर कायम सास ससुर को दिल की बात भी नहीं कह पाती है।
            चूल्हा-चौका करती रेणू के सामने गुजरे वक्त में गुजरे हमसफर से किया हर वादा एक फ़िल्म की तरह चलता रहता। नीरज कहा करते-" देख, तू सूबेदार नीरज राठौड़ की बीबी है। वो नीरज राठौड़, जिसने कभी मैदान-ए-जंग में या किसी जगह ज्यादती बर्दाश्त नहीं की। फर्ज निभाना सीखा, पीठ दिखाना नहीं। मैं देश के मोर्चे पर हूँ, घर का मोर्चा तेरे हाथ में। बच्चों का भविष्य तुझे बनाना है।" नीरज जब तब घर आए, मेहमान के रूप में ही आए। बच्चों का पिता के साथ परिचय भी मेहमान का रहा। पति के बिना बच्चों और माता पिता की देखरेख, हर मोर्चे पर अकेले जिम्मेदारी उठाना- रेणू स्वावलंबी बन गई। रेणू सोचती-'मैं अकेले परिवार को संभाल रही हूँ।' नीरज सोचता-'मैं परिवार के लिए बॉर्डर पर बैठा हूँ।' कई बार नीरज फौजी वाला बर्ताव करने लगते। बेटे से भी अनुशासन की उम्मीद करते। फौजी तो फौजी होता है। वह भूल जाता है कि उसका बच्चा सिविलियन है।
            दोनों बच्चों के बीच रेणू लेटी है- आंखों से नींद गायब है। पुरानी बातों की याद से दिल में टीस उठ रही है, जिसे रात की खामोशी जाने कितना बड़ा कर देती है। हर आंख में आँसू है और जुबाँ पर आक्रोश। नीरज ने मोर्चे पर सदा अपना फर्ज निभाया। आत्मघाती हमले में शहीद हो गए। आज उनकी शहादत देश के लिए गौरव का विषय है, परिवार के लिए उससे बढ़कर। रेणू ने खुद से वादा किया-' मैं वीरांगना हूँ। घर में दुःख, संत्रास, वेदना का कोई स्थान नहीं रहेगा। माता पिता का मुझे ध्यान रखना है और दोनों बच्चों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित।
             बदलाव की बयार है। अब उम्मीदों का नवसूर्य उग गया है।
               

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