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सावित्री -भाग-2 एक माँ की पीड़ा

            मैं सुंदर के लिए चिंतित थी। सावित्री के घर पहुंची, वहां की स्थिति देख कर स्तंभित रह गई। दोनों के बाल बिखरे हुए, मुँह सूखा हुआ, अस्त व्यस्त, मानो कई दिनों से नहाए नहीं, कुछ खाया नहीं और सोए नहीं। एहसास हो रहा था- दोनों के आँसू भरे हुए हैं, पर रुके हुए हैं। घनश्याम का भाई और उसकी पत्नी दोनों को ढांढस दिला रहे थे। सुंदर पलंग पर लेटा हुआ कराह रहा था। नाभि के नीचे दर्द बता रहा था। मैंने पूछा- " सावित्री, डॉक्टर को दिखाया?"
" हाँ, भाभी, गए रहीं, डागदर दावा दिए।"
"पर डॉक्टर ने क्या बताया ?"
"पेसाब में इनफेक्सन।"
घनश्याम का भाई बोला-" कल हम सभी घूमने गए थे, वहां बच्चे तालाब में उतर गए थे-पानी में खूब खेले। वहीं से इन्फेक्शन हो गया है।" सुंदर की तड़प देखकर  मुझे स्थिति चिंताजनक लगी। दो दिन सावित्री काम पर नहीं आई। तीसरे दिन मैंने अपने घर की बालकनी से देखा- घनश्याम सुंदर को गोद में ले कर ऑटो से उतर रहा है और सावित्री पेमेंट कर रही है।
            थोड़ी देर बाद मैं सावित्री के पास गई। सावित्री के कहे अगनुसार पता चला-' दूसरे डॉक्टर को दिखाया है। पिछले डॉक्टर की दवा से आराम नहीं मिला।' इस तरह दो तीन दिन और निकल गए।। सावित्री काम पर नहीं आई। हाँ, एक दिन घनश्याम गाड़ी की सफाई के लिए गाड़ी की चाबी लेने आया,  तो आधे अधूरे समाचार मिले। घनश्याम की आदत ज्यादा बोलने की है नहीं, पूरी जानकारी मिल नहीं पाई। इस बीच घनश्याम ने कई घरों से दोनों के नाम पर थोड़ा-थोड़ा लोन ले लिया। करीब बीस हजार रुपयों का कर्जा चढ़ गया। सावित्री, घनश्याम के भाई बंधु आते जाते रहते। कितने ही डॉक्टर बदल लिए। कोई झाड़ा देने वाले को ले आया, कोई तावीज बनवा लाया।
            सावित्री सदा ही बहुत मिलनसार और सबकी शुभचिंतक रही है। इनके रिश्तेदार हमेशा सावित्री की हर बात का मान रखते हैं। स्कूल की छुट्टी के दिन किसी न किसी रिश्तेदार के घर में सभी इकट्ठा हो लिया करते थे। जब घनश्याम के यहां इन सब का आना होता, तो घर की रौनक और सावित्री की खुशी देखते बनती थी। आज दुःख तकलीफ में ये सभी इन दोनों के बगल में खड़े हैं। कई दिनों से सावित्री के घर चूल्हा नहीं जला। सुंदर की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था। करीब 15 दिन इसी तरह निकल गए।
            उगते सूरज के साथ दुःखद खबर मिली- सुंदर को अस्पताल में भर्ती किया है। मैंने घनश्याम के मोबाइल पर फोन किया। घनश्याम के भाई ने फोन उठाया। बोला- " रात से सुंदर का पेशाब उतरना बंद हो गया है, पीड़ा बढ़ गई, इसलिए अस्पताल  में ले आए। सुंदर आई सी यू में है।" फोन रखते ही मैं धम्म से सोफे पर बैठ गई। अगले दिन खबर मिली-सुंदर का देहांत हो गया। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। घनश्याम और सावित्री की बदहवासी आंखों के आगे घूमने लगी।
            कई दिन सोसायटी में ग्राउंड फ्लोर का माहौल गमगीन बना रहा। जब भी बच्चे नीचे खेलते, उन्हें सुंदर की कमी महसूस होती। दस वर्ष का बच्चा, माँ-बाप ने इलाज के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया, पर वह छोड़कर चला गया। कलेजे के टुकड़े के गम में माता पिता के आंसू थमते ही नहीं थे। अपने इकलौते बच्चे में उनके सपने थे, अरमान थे, बहुत आस बंधी थी। मैंने एक बार कहा था- "सावित्री, तुम दोनों के सभी भाईयों के परिवार में 2-3बच्चे हैं। तेरे एक ही बेटा है। कभी दूसरे बच्चे की नहीं सोची!"
"भाभी, एक ही लइका का भभीस्य अच्छा बनिहैं तो हमार भभीस्य भी बढ़िया बनिहैं। अच्छा पडीहे, लिखिहे। हम ए का चूकीदार ना बनाइहे।"
            आज दोनों की झोली खाली हो गई। सावित्री अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी। सावित्री को संभालने के लिए घनश्याम ने अपने आँसू रोक लिए थे। कई महीने सावित्री गुमसुम ही रही। घर से बाहर ही नहीं निकली। घनश्याम कर्ज से दबा हुआ था, पर दुःख से शरीर भी पस्त हो चुका था। एक दिन घनश्याम को तेज बुखार हुआ।
     -26 जून 2020

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