बर्तनों की इतनी ज्यादा आवाज मुझे अच्छी नहीं लग रही थी। यह तो पता था-बर्तन माँजने के लिए सावित्री आ गई है। गिलास के गिरने की आवाज से मैं चौंक गई। बर्तनों में कांच के बर्तन भी हैं, टूट गए तो नुकसान तो होगा ही, कांच के टुकड़ों से किसी के घायल होने की आशंका भी बनी रहेगी। इससे पहले बर्तनों का इतना शोर कभी नहीं हुआ। सच कहूं तो सावित्री का सिर्फ घर में घुसना और काम करके बाहर जाना ही पता चलता था। अभी भी बर्तनों की आवाज आ ही रही थी। मैं उठकर रसोई में गई। मैंने पूछा-"सावित्री, तू ठीक है ना! कुछ परेशानी है क्या?"
" हाँ, भाभी, मे ठीक हे, सॉरी।"
सावित्री काम कर के चली गई।
सावित्री हमारी सोसायटी के चौकीदार घनश्याम की पत्नी है। ये गोरखपुर के रहवासी हैं। कई वर्षों से ये दोनों हमारी सोसायटी में रह रहे हैं। इससे पूर्व रवि चौकीदारी करता था। वह जवान था, हिंदी अच्छी बोल लेता था। एक दिन हमारे घर आया, बोला- "मैं कल यहाँ की नौकरी छोड़कर जा रहा हूँ। मेरी दूसरी जगह नौकरी लग गई है। बड़ी सोसायटी है, बड़ा शहर है, अच्छी तनख्वाह है। यहां मेरी जगह घनश्याम आएगा। मेरा परिचित है। मैंने सोसायटी के सेक्रेटरी साहब से बात कर ली है।" इन्होंने कहा-"वाह, तुम्हारी तो तरक्की हो गई है।" वह मुस्कराया- "सब आप लोगों का आशीर्वाद है।" रवि के जाने के बाद हम दोनों बात करते रहे। कितनी संतुष्टि है-इन्हें इस तरक्की में। रहेगा चौकीदार ही, पर बड़ी सोसायटी, बड़ा शहर, बड़ी तनख्वाह....। हम डिग्री-होल्डर्स पदों की तरक्की पा भी लें, तो भी शिकायत बनी रहती है। रवि अपने परिवार के साथ चला गया।
अगले दिन मेरी मुलाकात हुई घनश्याम और सावित्री से, साथ में उनका चार वर्षीय बेटा सुंदर। नाटे कद की, गौरी, साधारण-सी सावित्री और पतला दुबला, सांवला-सा घनश्याम। दो दिनों में दोनों ने सोसायटी के कई परिवारों से संपर्क कर लिया, परिचय पा लिया और परिचय दे दिया। सुंदर भी बच्चों के साथ घुल मिल गया। सावित्री की बोलचाल में गोरखपुर की भाषा का लहज़ा आता है। घनश्याम चौकीदारी करता है, साथ ही लोगों की गाड़ियां साफ करता है। सावित्री घरों में बर्तन और साफ-सफाई का काम करने लगी। अपने -अपने काम ले अलावा ये दोनों लोगों के अन्य छोटे-मोटे काम भी कर दिया करते हैं। घनश्याम साधारण है, सीधे रास्ते पर चलने वाला इंसान है। सावित्री काफी मिलनसार और तेज तर्रार औरत है। हर काम को सुचारू रूप से करने का उसका अंदाज अलग है। जल्द ही इसने अपने स्वभाव और मेहनत के कारण अच्छी छवि बना ली। सुंदर स्कूल जाने लगा। सावित्री ने अपने एक कमरे के मकान को रसोई और एक कमरे में विभाजित कर लिया।
समय ने रफ्तार पकड़ी। सुंदर दस वर्ष का हो गया। सुकून से निकलते हुए दिनों में कब तूफान ने आहट दे दी , पता नहीं चला। एक दिन की छुट्टी ले कर घनश्याम अपने परिवार को अपने रिश्तेदारों के साथ घुमाने ले गया। अंधेरा होने तक लौट भी आए। अगले दिन सुबह मेरे मोबाइल पर सावित्री का फोन आया-"भाभी, काम पे ना आ संकु हुं, लइका बीमार हे।" मैं कुछ अचंभित हुई और मेरे मन में कई प्रश्न उठ गए। आज तक सावित्री ने छोटी मोटी तकलीफ में छुट्टी नहीं ली, जरूर सुंदर ज्यादा बीमार होगा, मुझे उसे देखने जाना चाहिए।
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