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सावित्री- भाग -4 एक निर्णय सही या गलत

            घर के काम पूरे होने के बाद मैंने सोचा- सावित्री के हाल चाल ले लूं। जैसे ही उसके घर के पास पहुंची-उसके जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दे रही थी। वह किसी से फोन पर बात कर रही थी। मेरे पदचापों से उसने फोन काट दिया। सावित्री को देख कर मैं स्तब्ध रह गई। बाल बिखरे हुए, आंखें सूजी हुई, मानो बहुत रोई हो। जले हुए हाथ को ढक रखा था। घर की दीवारें साफ थी। कहीं कुकर फटने के निशान नहीं थे। मेरे दिमाग में कई प्रश्न कौंध गए। फिर भी हिम्मत करके पूछा- "सावित्री क्या हुआ? घनश्याम ठीक है ना!"
" वो तूफान मचाए हे।"
मेरे दिमाग में घनश्याम के प्रति एक पत्नीव्रता और सीधे-सादे पति की छवि बैठी हुई थी। वह भला कैसे तूफान मचा सकता है? कोने में रखे स्टूल पर मैं बैठ गई। सावित्री मेरे सामने बैठ गई। बोली-" भाभी, अब मन ना लगे है, टेम केसे निकलिहे। जिंदगी बोत भारी हे। कोई चाव ही ना बचा। गाड़ी ....रेंगरी...।"
यह किस बात के लिए इतनी भूमिका बना रही है, मैं समझ नहीं पाई।
"घनसाम हमार चाचा के मरे पे गया हे। चाची कई बरस पहले खतम भइ। चाचा की लईकी हमार भेंन अनाथ भइ। सादी लायक है। घनसाम से बोली इससे सादी कर ले। भेंन है साथ जी लहिए। घनसाम राजी ना हे। वो तूफान मचाए है।"
" सावित्री, कल तक तो तुम घनश्याम की दूसरी शादी के पक्ष में नहीं थी, अब यह निर्णय?"
"भाभी, तम सोचो, घनसाम की भेंन दूसरी सादी करा देती, तो वो मुझे जूत समान रखती। घर से निकाल देती। भाभी, मेरी भेंन अनाथ हो गई। भटकिहे। क्या जिंदगी रहिन ?"
"पर सावित्री तुम्हारे इस निर्णय से तीन की जिंदगी प्रभावित होगी, सोच समझ कर निर्णय लेना।"
मेरे मन में विचार आया-कहीं ऐसा तो नहीं, घनश्याम पर दूसरी शादी का दबाव डालने के लिए ही सावित्री ने अपना हाथ जलाया हो! सावित्री काम करने आती रही। उसके काम करने के तरीके से जाहिर हो रहा था, तूफान अभी शांत नहीं हुआ। इसके पिछले कदम के कारण मैं भी उसे कुरेदना नहीं चाहती थी।
            चौथा दिन, सावित्री का रूप अलग ही था। बढ़िया सूट पहने, व्यवस्थित बाल, पाउडर, लिपस्टिक लगाए सज धज कर घर में घुसी। मुस्कराते हुए नमस्ते किया। काफी दिनों बाद इसे मुस्कराता देख मैं खुश हुई। पर इस काया पलट के लिए अचंभित हुई। पूछ ही लिया- "घनश्याम आ गया ?"
" नहीं भाभी, काल आइहे।" कह कर बैठ गई। मैं जानती थी-अपने भीतर के तूफान के शांत होने का विवरण यह जरूर देना चाहेगी। बोली- "भाभी, सुबह घनसाम ने मेरी भेंन तुलसी से सादी कर ली। गाडी मे है, कल आइहे।"
"सावित्री, वो अब तेरी बहन थोड़े ही 'सौत' कहलाएगी।"
" भाभी, बिन मा बाप की जवान लईकी पे सबकी नजर रहिए। हमार घर आइहे, वंस चलिहे। जीने में खुसी आ जाइहें।"
सावित्री के त्रिया-हठ को देख कर मैं दंग रह गई। येन केन प्रकारेण इसने घनश्याम को दूसरी शादी के लिए राजी कर ही लिया। अपने ही हाथों अपने पति का बंटवारा? एक स्त्री सब कुछ बांट सकती है, पर अपने पति को बांट पाना उसके लिए संभव नहीं। मेरे जेहन में कई प्रश्न उठ गए- क्या तुलसी अपनी बड़ी बहन के त्याग को समझ पाएगी? क्या दोनों में रिश्ता सौतन का न होकर बहनों का रह पाएगा ?
            अगले दिन सावित्री जल्दी जल्दी काम कर के चली गई। उसे नई बहू का स्वागत करना था। शाम को सब्जी लाने के लिए मैं घर से निकली, सावित्री के घर के पास पैर ठिठक गए। सिर ढकी हुई, पतली -दुबली, सुंदर तुलसी ने मेरे पैर छुए। देख कर दुख हुआ- उसके एक हाथ की कलाई और एक पैर का पंजा पोलियो ग्रस्त है।
            आज चार वर्ष हो गए हैं- तुलसी को सावित्री के घर में आए हुए। तुलसी एक पुत्री और एक पुत्र की माँ बन चुकी है। सावित्री ने तुलसी के लाड़ में कोई कमी नहीं रखी। दोनों जापे में तन मन से तुलसी की सेवा की। घर के काम की पूरी जिम्मेदारी तुलसी के सुपुर्द है, जिसमे घनश्याम का पूरा सहारा रहता है। सावित्री ने अब काम के लिए घरों की संख्या बढ़ा ली।
            कॅरोना-महामारी फैली-सावित्री ने इस बीमारी के बारे में मेरे से पूरी जानकारी ली। बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति हमेशा जागरूक रही। एलान कर दिया- तुलसी और बच्चे घर से बाहर नहीं निकलेंगे। लॉक डाउन घोषित हुआ-सावित्री की समस्याएं बढ़ गई। खाने-पीने के सामानों की किल्लत रही। बेटा चार महीने का हो गया- टीका लगना जरूरी है। सावित्री के कहने पर मैंने सरकारी अस्पताल में फोन किया। पता चला- सरकारी अस्पताल में नहीं, सरकारी स्कूल में सप्ताह में दो दिन टीके लगाए जाते हैं। सरकारी स्कूल हमारी सोसायटी से 2 किलो मीटर दूर है। ऑटो रिक्शा बंद। घनश्याम को साइकिल चलानी आती नहीं। मेरे पास आई, बोली- "भाभी, 5000 रुपए दे दो। जरूरत हे।" 
सावित्री ने मुंह पर लगाया मास्क और पोटली में बच्चे को लपेट कर अकेली चली गई। दो दिन बाद मैंने फोन कर के पूछा- "सावित्री,, बेटे को टीका लगवा लाई क्या ?"
"भाभी, गए रहिन, स्कूल में कोनू डागदर ना मिलया। पराइबेट डागदर 3000 रुपए लिए- टीका लगाइके। भाभी, लॉक डाउन कब तक रहिए, पता नहीं। लइका के बार बार ले जाइके मुसकिल हे।"
            बच्चों में सावित्री की जान बसती है। बच्चों के प्रति लापरवाही होने पर तुलसी और घनश्याम इस से फटकार खाते ही रहते हैं। तुलसी ने सदा ही सावित्री को बड़ी बहन का दर्जा दिया। बच्चों की किलकारियों से घर चहक रहा है। सावित्री और घनश्याम के जीवन में खुशियां आ गई हैं। अपनी सुघड़ता और परिवार संचालन में प्रवीणता के कारण सावित्री घर की मुखिया है। कई बार मेरे दिमाग में यह प्रश्न उठता है कि अपनी चचेरी अपाहिज बहन को सौतन के रूप में स्वीकारना- सावित्री का त्याग था या स्वार्थ ? खैर, फिर भी सावित्री की दूरदर्शिता, सूझबूझ और महान त्याग के आगे में सदा नतमस्तक रहूंगी।
            आप सभी के दिमाग में यह विचार आया होगा-सावित्री एक अनाथ बच्चे को गोद ले लेती, तो उसे इन कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता और एक अनाथ बच्चे का जीवन संवर जाता। पर यह इनके समाज में इतना सहज नहीं है। अपने खून को ही वे वारिस मानते हैं। परिवार, समाज के विरोध में रह कर कोई निर्णय लेने की इनमें हिम्मत नहीं। फिर उस बच्चे का भविष्य क्या होता-जिसे माँ बाप के अलावा कोई नहीं स्वीकारता !
   

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