घनश्याम के तेज बुखार ने सावित्री में हलचल ला दी। डॉक्टरों के इर्द गिर्द घूमना, सेवा सुश्रुषा, शारीरिक पीड़ा-इन सभी दर्दों को वह भूली नहीं थी। रात घनश्याम के लिए काढ़ा बनाया, वह सो गया। सुबह मेरे पास आई, " भाभी, घनसाम को बुखार है। क्या करूं? डागदर के पास...।" वह अधूरे वाक्य के साथ चुप हो गई। मैं समझ गई-यह डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती है। मैने किसी को भेज कर घनश्याम का बुखार नपवाया-100 ही था। एक गोली दे दी और काढ़ा भी देने को कह दिया। शाम तक घनश्याम का बुखार उतर गया। कमजोरी थी दो दिन आराम कर लिया। घनश्याम के बुखार ने सावित्री को सचेत कर दिया। निस्तेज बनी सावित्री में कुछ तेजी आई।
सावित्री मेरे पास आई, "भाभी, गांव जाइहें। बड़का सास ससुर है मिलिहैं।"
''कब तक आओगे?"
"दस दिन तो लगिहैं!"
दस दिन के लिए घनश्याम ने अपने किसी परिचित को ड्यूटी पर लगा दिया। 20 दिन....दोनों आ गए। अगले दिन सावित्री घर आई। मैंने पूछा- "चाय पिएगी?"
" हाँ "कह कर वह बैठ गई।
"तेरे सास ससुर कैसे हैं?"
"ठीक"-सावित्री की बोली में उदासी दिख रही थी। वह चुप थी। कहीं खोई हुई, धीरे धीरे चाय की घूंट ले रही थी। इसकी चुप्पी मुझे एहसास करा रही थी- इसे कोई नया दर्द कचोट रहा है और यह दर्द को मेरे सामने लाना चाहती है। मैंने ही कहा-"तुम्हें काफी दिन लग गए?"
"हाँ, इलाज खातिर रुके रहे।"
"किसका इलाज?"
" हमार"
"क्या हुआ तुझे?"
" बड़का लोग जोर दिए रहिन एक बच्चा कर लो। वंस चलिहे।"
"तो तूने किसे दिखाया?"
"ननद डागदर के लि गई। दवा दी हे। झाड़ फूंक, टोटके भी कराई।"
सावित्री ने अपनी चुन्नी हटाकर गले में पहना हुआ तावीज दिखाया। उसके कहने से खुलासा हुआ कि दवा और तावीज दोनों ही इसे माँ बनने में प्रभावकारी रहेंगे। मैं इस विषय में कुछ बोलकर इसके विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती थी। बात को टालते हुए मैंने कहा-"तू काम करने कब से आ रही है?दूसरी बाइयों से काम कराने में हमें दिक्कत हो रही है।"
"भाभी, एक तारिक से करीहें।"
एक तारोख से सावित्री काम करने आने लगी। थोड़ी सामान्य तो हुई, पर जब तब रुआंसी हो जाती। पहले वाली हंसमुख सावित्री कहीं गायब हो गई थी! सदा से ही सावित्री अपने स्वभाव के कारण सोसायटी में एक पहचान बनाए हुए थी। जिन घरों में वह काम करती थी, उन घरों में नियमित रूप से आने जाने वाले मेहमान भी इस से परिचित थे। इस से बात करना पसंद करते थे। इधर सावित्री कई महीने दवा लेती रही। गले में तावीज भी चमक ही रहा था। एक दिन सावित्री आई, बोली- "भाभी दवा खतम भई। डागदर को दिखाइहें।" फिर वही परिचित घनश्याम की ड्यूटी पर आ गया।
पूरे सात दिन बाद सावित्री का फोन आया-' भाभी, मे आ गई, बरतन करेगी। उदास चेहरा, छोटी-सी बिंदी, बिना मैचिंग के कपड़ों में सावित्री ने घर में प्रवेश किया। काम पूरा होने के बाद पानी का गिलास ले कर बैठ गई। उसके मौन से मैं समझ गई थी, यह मुझसे कुछ कहना चाहती है।
"डॉक्टर ने क्या कहा?"
"भाभी, डागदर की दवा से सरीर खराब भया, अब माँ ना बन सकूं हूं। नसीब में सुंदर ही ना था! ननद ओर उ बड़का लोग कहे घनसाम दूसरी सादी कर ले। घनसाम राजी ना है। में जानू सोत आइहे, हमार कदर ना रहिए।"
"तुम कोई बच्चा गोद क्यों नहीं ले लेती?"
"बच्चा घनसाम के होइके।"
मैं सावित्री का दर्द समझ रही थी। हम दोनों निःशब्द थे। दिन बीतते गए। सावित्री की मायूसी कम नहीं हुई। उससे पता चलता रहता था कि गांव से ननद का फोन आता रहता है-सिर्फ यह कहने के लिए कि घनश्याम को दूसरी शादी के लिए राजी कर लो। अब सावित्री ने ननद का फोन उठाना ही बंद कर दिया। घनश्याम की दूसरी शादी की सोच से ही उसकी रूह कांप उठती। सुंदर को गुजरे चार वर्ष हो गए थे।
मेरे मोबाइल पर घंटी बजी, सावित्री के जीवन के फ़्लैश बैक से मेरा ध्यान हट गया। घड़ी पर निगाह डाली, शाम के छह बजे रहे थे। सावित्री का फोन था- 'भाभी, तबेत ठीक ना है, तड़के आऊंगी।' मैं कुछ कहती उससे पहले ही उसने फ़ोन काट दिया। सुबह हुई बर्तनों की आवाज अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी। मुझे पता था- घनश्याम किसी के देहांत पर गांव गया है। इसने साथ जाने से मना कर दिया।
अगले दिन सुबह छह बजे घर की घंटी बजी। मेरे सामने सावित्री खड़ी थी। एक हाथ काफी जला हुआ था- मैं घबरा गई। तुरंत उसे बैठाया और मलहम लगाया। मैंने पूछा- "यह कैसे हुआ? "
"कुकर फट गया।"
इसने मेरे साथ डॉक्टर के जाने से मना कर दिया। इसके इस तरह हाथ जलने पर मुझे शंका हुई-। कुकर फटने से ?
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