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ख्वाहिश

ख्वाहिश ही तो है, रह रह कर
     उठना है इसकी फितरत।
जिंदगी के हर पड़ाव पर अरमान
      हैं कि जमे रहे अन्तरत।

मुद्दत से इन आँखों में
     तरवरिश नहीं झलकी।
ख्वाहिश की कोई इन्तिहा नहीं
     क्यूं कर अब छलकी।

जाने कल जिंदगी के फैसले का
     होगा क्या इम्कान।
ख्वाहिश- शेष लम्हे हंस कर बिता लें
     न हो कोई हलकान।

इस काबिल नहीं, कलम बन
     किसी की खुशियां लिख दूँ।
हाँ, ख्वाहिश यही, रबड़ बन
     किसी के गम मिटा दूँ।

वर्षों से जज्बात, एहसास अब
     क्यों तो जाग गए ?
अरमानों को सदा दिल में दबा
     'काश' ही बढ़ गए।

स्नेह, उमंगों का हो संचय, 
     सदा करूँ ऐसा काम।
हर परिजन की यादों में
     लिखा रहे मेरा नाम।

प्रभु, ख्वाहिश यही अगला जन्म
     पंछी बन कर पाऊं।
मंदिर हो या मस्जिद, स्वच्छंद हो
     मुंडेर पर बैठ जाऊं।

जात-धर्म का न कोई डर,
     'खुले पंख' पा मैं इतराऊँ।
मजहब का न कोई बंधन, ख्वाहिश 
     मेरी पूरी कर जाऊं।

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