मैं मम्मी पापा के पास इंदौर आया हूँ। 10 दिन पूर्व ही पापा को रिटायरमेंट मिला है। सोहम की पढ़ाई के कारण शिवानी और सोहम नहीं आ सके। मैं कुछ दिन इंदौर रहूंगा। कई महीनों से पापा को अपने रिटायरमेंट का इन्तजार था। जब-तब फोन पर कहा करते- 'बहुत कर ली भाग दौड़, अब आराम करूंगा।' मानो कोई जश्न की तैयारी हो।
मुझे दो दिन में ही घर में काफी परिवर्तन लगा। पापा की दिनचर्या ही बदल गई। देर रात में सोना, देर से उठना। टी. वी. अखबार, किताबों में दिन बीतता, एक दो चाय-कॉफ़ी की एक्स्ट्रा डिमांड। मम्मी की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं। यहां दादी-दादाजी साथ में रहते हैं। मम्मी ने सुबह उठकर तीनों के लिए चाय बना ली, तीनो ने साथ में पी ली, फिर लग गई अपनी ड्यूटी पर। पापा उठे, तब उनके लिए अलग से चाय बनी। पहले, चारों साथ में बैठकर चाय पीते, अखबार, घर-परिवार, रिश्तेदारों की चर्चा होती। सुबह की चाय चारों के चेहरे पर मुस्कान और आत्मीयता ला देती।
पहले घड़ी की सुई से काम बंधे थे, अब ऐसा नहीं। पापा के टिफिन का खाना बना, तभी सब का, बस---। अब पापा को लंच में थाली भरी-पूरी चाहिए- दाल सब्जी, चावल, रोटी, सलाद, दही। सुबह से शाम तक का एक सेवक है, पर उसे घर की साफ सफाई, बर्तन कपड़ों से फुर्सत कहाँ? दोपहर चार बजे मम्मी ने मठरी बनाई। पापा को चाय के साथ मठरी पसंद है। पांच बजे मम्मी थैला ले कर तैयार। मैं भी उनके साथ हो लिया। सब्जी, फल अनाज से तीन थैले भर गए। मैंने पूछ ही लिया- "मम्मी ये थैले ले कर आप घर कैसे जाती ?"
" बेटा, मैं सामान लेने के बाद रिक्शा ही करती हूँ।" हम रिक्शे से घर आ गए। मैंने मम्मी के लिए शिकंजी बनाई, उनकी मुस्कान से मुझे राहत मिली। रात 9 बजे मम्मी अपने कमरे में गई। दिन भर में पंद्रह चक्कर तो वे दादी के कमरे में ही लगा लेती हैं-दवाई, दूध, पानी, नाश्ता, खाना- सभी तो मम्मी के जिम्मे था। रोज रोज वही करना- मम्मी का जीवन एकरस बन चुका है। वे लेटी ही थी, मैं उनके पैर दबाने लगा। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा- इस असीम सुख को पा कर मैं बच्चा बन गया।
दो दिन में ही मैं विचलित हो गया। मैंने सोचा था- पापा के रिटायरमेंट के बाद मम्मी को मदद मिलेगी! मम्मी तो कहने से रही। यह भी जानता हूँ- पापा से कहना-उनके सम्मान को ठेस पहुंचाना होगा। एक ही दिन में बदलाव सम्भव नहीं, शनैः शनैः...। अगले दिन सुबह करीब साढ़े पांच बजे बहुत गर्मी लगी, पूरे घर की लाइट जो चली गई। मैं मुख्य मीटर बोर्ड को देखने आया तो देखा- मम्मी टोर्च जला कर स्टूल पर खड़ी हैं। तभी पापा भी आ गए। मम्मी ने एक बटन दबाया, लाइट आ गई। पापा बोले- "वाह, तुम तो बिजली का काम भी जानती हो।" मम्मी झेंप गई, बोली- "पिछली बार इलेक्ट्रीशियन आया था, बता गया था, यह बटन ट्रिप हो जाता है।" पापा वापस सोने जा रहे थे, मैंने कहा-"पापा, मैं सबके लिए चाय बना रहा हूँ , साथ में बैठेंगे।" तीन पीढ़ी साथ बैठी, चाय का स्वाद ही बढ़ गया। अभिभावक कड़ियों की तरह पीढ़ी को जोड़ते हैं। एक पीढ़ी का प्रतिबिंब दूसरी पीढ़ी में दिखाई देता है। ये सिलसिले हैं, भावों के , अहसासात के, मैं इनसे वंचित नहीं होना चाहता हूँ। मैं पापा को लेकर वॉक पर गया और जाते जाते मम्मी से कह गया- हल्का नाश्ता बनाना, जरूरत हुई तो ब्रेड बटर ले लेंगे।
मैं मम्मी के काम में मदद करने लगा। पर कब तक? मैं कोलकता चला जाऊंगा, फिर...? मुझे तो पापा को मददगार बनाना है। फिर एक दिन, मैंने एलान कर दिया-'आज पूरा लंच मैं बनाऊंगा।' मम्मी अपने कपड़ों की अलमारी व्यवस्थित करने में जुट गई। बस, मैं मदद के लिए पापा को ही बुलाता रहा, सब्जी कटवा दो, दाल में छौंक लगा दो। पापा बार बार कहते- "यार, तू मुझसे क्या क्या करवा रहा है? मुझे यह सब नहीं आता। जिंदगी में कभी ये किया नहीं।"
" पापा, जो कभी किया नहीं, वही तो अब करना है। अरे हाँ, एक बात बताओ- मम्मी को किस चीज का हलवा पसंद है? उन्हें सरप्राइज देंगे।"
"मुझे क्या पता? तेरी मम्मी को क्या पसंद है?"
"पापा, आपने इतने साल साथ में गुजारे, कभी उनकी पसंद नही जानी। वे तो आपकी हर पसंद का ध्यान रखती हैं। खैर, मुझे पता है-मम्मी को सूजी का हलवा पसंद है।" पापा निस्तब्ध थे। हम सब ने साथ में खाना खाया। पापा बोले- "शुभांग, तुझे खाना बनाने में शिवानी ने एक्सपर्ट कर दिया है।"
"अरे पापा, सोहम को अपने दादा की तरह वैरायटी चाहिए। कई बार शिवानी ऑफिस से लेट आती है, तो मुझे यह सीखना पड़ा।"
" तू अब डिनर की जिम्मेदारी मत ले लेना।"
"क्यों पापा, मम्मी तो सारा काम अकेले ही करती हैं। हम दो समय का खाना तो बना ही सकते हैं!"
"तू कह तो सही रहा है। ऐसा करते हैं- डिनर में हम तेरी मम्मी की मदद कर देंगे।" यही तो मैं चाहता था। दादी, मम्मी मुस्करा रहे थे।
अब प्रायः सुबह की चाय पापा ही बनाया करते। दादी दादाजी के काफी काम पापा के जिम्मे हो गए। शाम को सब्जी लाने के लिए मम्मी ने थैला उठाया। मैंने पापा से कहा-"आप मम्मी के साथ चले जाओ?"
"अरे सब्जी के मोल भाव करना- मुझे पसंद नहीं।"
"पापा आपको कुछ नहीं करना है, मम्मी की मदद करनी है।"
घर में सभी का स्नेह मुझ पर अक्षुण्ण रहा। इसलिए किसी ने वाजिफ बात का कभी विरोध नहीं किया। वैसे भी कुछ कदम एक पीढ़ी बढ़ाएगी और कुछ समायोजन पुरानी पीढ़ी करेगी, तो कदमताल सही होंगे-यह निश्चित है।
दस दिन में घर की दिनचर्या में काफी बदलाव आ गया। पापा मम्मी का बहुत ध्यान रखने लगे, मम्मी के हर काम में उनका सहयोग रहने लगा। समय मिलने पर दोनों लैपटॉप पर मूवी देखते। कभी चारों लूडो खेलते- उस समय सभी के चेहरे पर खुद जीतने और दूसरे को पछाड़ने की प्रतिस्पर्धा का जोश दिखाई देता।
एक दिन पापा मुझ से बोले- "आज मैं अहसास कर रहा हूँ। घर के अंदर रहकर भी तेरी मम्मी का जीवन बड़ा आपाधापी वाला है। इसका पूरा समय सभी की सुख सुविधाओं को जुटाने में लगा रहता है। हम दफ्तर में आठ घंटे काम करके वेतन तो पाते हैं, पर गृहिणी का घर का काम सोलह घंटे और वह भी अवैतनिक। मुझे कई महीनों से अपनी सेवा निवृत्ति का इन्तजार था, इन्तजार तो इनको भी होता होगा! पर गृहिणी तो सेवा निवृत्त हो ही नहीं सकती। तूने मुझे वो बात समझा दी, जो मैं कभी समझ नहीं पाया। खैर, सुबह का भूला, समय पर घर लौट आया।" मुझे मेरे पापा पर गर्व है।
-2 जून 2021
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