Skip to main content

यह कैसा दोष

          रमेश का ग्रेजुएशन हो गया था। वह आगे पढ़ना चाहता था, पर पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। व्यापार को संभालने के लिए पिताजी को सहयोग देना जरूरी था। छोटा भाई राजीव आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जा चुका था। पिताजी स्वस्थ हो गए, पर रमेश की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग ही गया। विवाह हो गया, जिम्मेदारी बढ़ गई। राजीव ने पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेश में ही नौकरी कर ली। मां- पिताजी की पसंद की लड़की रश्मि से राजीव का विवाह हो गया। जब कभी राजीव भारत में रहता, परिजनों के प्रति अपार प्रेम उमड़ ही जाता। माँ दोनों बेटों  को साथ देखती तो कहती-"तुम दोनों मेरे राम लक्ष्मण हो।" ,विवाह के थोड़े दिन बाद राजीव, रश्मि विदेश  चले गए। वहीं के हो कर रह गए। राजीव ने बिज़नेस शुरू कर लिया- दोनों व्यस्त हो गए, परिवार बढ़ा, सब वहीं के रहन सहन में ढल गए। माँ बीमार हुई, बिस्तर पकड़ लिया। राजीव को खबर कर दी थी, पर उसने अपने नए बिजनेस का हवाला दिया और नहीं आया। माँ के देहांत पर भी नहीं आया। पिताजी के प्रति रमेश की जिम्मेदारी बढ़ गई। लोग कहते है - वे एक अच्छे परिवार से हैं। सवाल यह कि अच्छा परिवार बनता कैसे है? अच्छा परिवार यानी अनुशाषित और जिम्मेदार परिवार, जहां हर सदस्य नियम और कायदों से चलता है। साल भर में पिताजी भी दिल के दौरे से साथ छोड़ गए। तब भी राजीव नहीं आया। कैरियर की होड़ में संवेदना की बलि चढ़ गई। पिताजी के देहांत के बाद से राजीव को रमेश की कमी महसूस होने लगी। अपनों से बढ़ी चढ़ी एवं अधूरी अपेक्षाएं और उपेक्षा का द्वंद्व कई बार मानसिक तनाव का कारण बन जाता है। 10 वर्षों से राजीव भारत ही नहीं आया। अब तो उसके फोन भी भूले भटके आते हैं।
          रविवार का दिन, रमेश बैठे अखबार पढ़ रहे थे। सुबह सुबह उनके मोबाइल पर राजीव का फोन आया- "भैया, प्रणाम। भैया, यह परिवार दोष क्या होता है? "
रमेश- "तुझ से किसने कहा?"
" भैया, इन दिनों मैं बहुत परेशान हूँ। दो साल से बिज़नेस में बहुत घाटा हो रहा है। बच्चों का रिजल्ट भी बढ़िया नहीं आ रहा है। इधर कुछ महीनों से रश्मि की तबियत भी ठीक नहीं है। कल रश्मि की माँ के कहने पर हमने एक भारतीय ज्योतिषी से सम्पर्क किया। उसने कहा है-' आपके ऊपर परिवार दोष है। एक लम्बा खर्चा बताया है। आप इस दोष के बारे में जानते हो क्या? मुझे बताओ तो सही।"
" राजीव, यह दोष उन माँ बाप की वजह से होता है, जो दिन रात अपने बच्चों की सेवा में लगे रहते हैं। यह सोच कर कि जरूरत पड़ने पर ये बच्चे उनका ध्यान रखेंगे, परंतु जब बुढ़ापे और बीमारी में बच्चों की सेवा नहीं मिल पाती है, यही परिवार-दोष बच्चों को लगता है। इस के निवारण के उपाय उन ज्योतिषी से ही जान लो, तो अच्छा है। बस, अभिभावक बन कर अपने बच्चों को समय और संस्कार जरूर देना, जिससे ये तुम दोनों का पूरा ध्यान रख सके, ये भी परिवार दोष से ग्रस्त न हों। बच्चे भी पूछ सकते हैं-  यह कैसा दोष?"
रमेश की आवाज भारी हो चुकी थी, उधर रश्मि के सुबकने की आवाज सुनाई दे रही थी। रमेश ने फोन रख दिया।

Comments

Popular posts from this blog

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...