कसमसाते विचार, घुटती साँसे,
एक कसक कुछ न कर पाने की,
खुद से करते अनगिनत सवाल,
बेड़ियों के बंधन की यह पीड़ा,
दबी सिसकती हुई यह चुप्पी।
यही है अंतर्मन का द्वंद्व।
समाज की सच्चाई का प्रतिबिंब हूँ,
रही विवशता मेरे व्याकुल मन की,
अनचाहे ढंग से कह दी अनकही बात,
वेदना का स्वर क्यूं कर कचोट रहा,
भीतर तमस घनघोर गहरा गया।
यही है अंतर्मन की व्याकुलता।
बदलती जिंदगी मुझे जीना सीखा रही,
हुआ कलुषित विकारों का प्रस्थान,
सच-झूठ के फर्क का हो रहा है ज्ञान,
भीतर की आवाज कर रही सजग,
अब आँखे मूंद, उसे सुन ही लूँगी।
मेरे अंतर्मन की आवाज।
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