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इच्छा का सम्मान

          डॉक्टर सक्सेना आज फिर अपने बड़े बेटे पर झल्ला पड़े-"सुनील, तुम इस तरह समय बर्बाद करते रहोगे, तो नीट कैसे क्लियर कर पाओगे?"
"पापा एक घंटे के लिए बैडमिंटन खेलने गया था। आपके कहे अनुसार कोचिंग भी जॉइन कर ली। आप जानते हो, मैं मेडिकल में नहीं जाना चाहता हूँ। मैं स्पोर्ट्स में अपना कैरियर बनाना चाहता हूँ।"
"क्या, मेडिकल में जाना नहीं चाहता? अरे, मेरा यह हॉस्पिटल कौन संभालेगा? तुम्हारा छोटा  भाई बीमार रहता है, उससे MBBS की उम्मीद नहीं कर सकता। तुम्हें हर हाल में नीट क्लियर करना होगा।"
'हमेशा दूसरों के हिसाब से जिंदगी जिओ।'-यह बड़बड़ाता हुआ सुनील अपने रूम में चला गया।
          डॉ. सूर्यकांत सक्सेना का बड़ा मल्टीस्पेशलिस्ट नर्सिंग होम है। कड़ी मेहनत से यह अस्पताल खड़ा किया है। छोटे शहर में इनका अलग रुतबा है। अस्पताल में कई स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स भी बैठते हैं, जिस से एक ही जगह कई बीमारियों का इलाज हो जाता है। सुनील के व्यवहार से डॉ. सक्सेना परेशान हो गए। रात पत्नी से बोले- इसे पढ़ाई के लिए दूसरे शहर भेजना पड़ेगा। यहां के यार-दोस्तों से दूर रहेगा, वहां के पढ़ाई करने वाले लड़कों से दोस्ती करेगा, तो पढ़ाई में मन लग ही जाएगा। दो दिन में सुनील और डॉ. सक्सेना कोटा पहुंच गए। वहां बढ़िया कोचिंग में एडमिशन हो गया। पास रहने के लिए किराए का एकल रूम, टिफ़िन, सारी व्यवस्था एक ही दिन में हो गई। हर थोड़ी देर में डॉ. सक्सेना हिदायत देते रहे- 'पढ़ाई में लापरवाही नहीं होनी चाहिए। तन लगा देना, मन लगा देना, धन की चिंता मत करना।' जाते-जाते वे पड़ोस के कमरे में रह रहे संजय का मोबाइल नंबर ले गए और इत्मीनान से घर लौट गए।
          सुनील ने कोचिंग में जाना शुरू किया। कई यार दोस्त बने। कई पढ़ाकू, कई रटते-राम, कई सीधे सादे, कई सुनील जैसे ही जो न चाहते हुए भी माता पिता के दबाव में आकर मेडिकल की तैयारी कर रहे हैं। सुनील ने कोशिश की- पढ़ाकू लड़कों से दोस्ती कायम रख सके। पर हर समय पढ़ाई की बात करना-उसे घुटन होने लगी। घर, यार दोस्तों से पहली बार दूर हुआ- उनकी याद सताने लगी। उसे पता नहीं चला-कब उसकी दोस्ती उस जैसे लड़को से हो गई- दिन पढ़ाई में कम, मस्ती में ज्यादा बीतने लगे। दोस्तों के साथ सिगरेट पीना सीख गया। रोज रात को माँ- पापा का फोन आ जाता, वे रोज याद दिलाते- 'तुम्हें पढ़ने के लिए भेजा है, तुम्हें अपनी मंजिल पानी है।' फोन उसे बैचेन कर देता, सोचता- 'मैं उस राह पर चल रहा हूँ, जिसकी कोई मंजिल ही नहीं है।' बैचेनी में देर रात तक नींद नहीं आती, ऐसे में सिगरेट पीना लाजमी हो जाता। अवसाद और तन्हाई के साथ दिन बीतते गए। नीट की परीक्षा का समय भी नजदीक आ ही गया। सुनील की घबराहट बढ़ने लगी, सिगरेट के कश भी बढ़ने लगे। नतीजे की फिक्र का जामा पहन कर डर सामने खड़ा है। अब सुनील ने पापा का फोन उठाना ही बंद कर दिया। डॉ. सक्सेना संजय का मोबाइल नंबर ले गए थे, उससे सुनील के समाचार लेते। वह खिड़की से देख कर कहता- 'अंकल, सुनील सो गया है।' जब कभी सुनील पापा से बात करता-चिड़चिड़ापन, आक्रामक व्यवहार और त्वरित गुस्सा जाहिर होने लगा।
          एक रात सुनील का मनोबल टूट गया, आत्मविश्वास कमजोर हो गया- नींद नहीं आ रही थी। सोचने लगा- पापा ने मेरी योग्यता का आंकलन नहीं किया। मेरे करियर में अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं को जिद की तरह खड़ा कर लिया है, जिसे हिलाना असम्भव है। दो सिगरेट पी, फिर भी बैचेनी दूर नहीं हुई। पास के मेडिकल स्टोर गया, बोला- "भैया, सिर दुःख रहा है, नींद नहीं आ रही है। कोई गोली देना।" केमिस्ट ने शीशी खोल कर एक गोली देनी चाही। सुनील ने पूरी शीशी ही खरीद ली। उलझन और दबाव भारी जिंदगी से सुनील का दिमाग घूम गया। एक साथ 6 गोली पानी के साथ निगल गया। तभी पापा का फोन आया, बात नहीं की। सुबह 7 बजे दोस्तों ने खिड़की से आवाज दी- 'सुनील कोचिंग नही जाना है क्या?' कोई हलचल नही हुई, तभी उन्हें सुनील के पास एक शीशी दिखाई दी। अनहोनी की आशंका से उन्होंने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। इतनी देर में संजय भी आ गया। उसने तुरंत डॉ. सक्सेना को फोन किया- हालात से अवगत कराया। लड़कों ने मिल कर दरवाजे को धक्का देकर सांकल तोड़ दी। तुरंत सुनील को पास के अस्पताल में भर्ती किया। शाम तक उसे होश आया। रात तक डॉ. सक्सेना कोटा पहुंच गए। पापा को देखते ही बोला- "पापा, मुझे माफ़ कर देना। मैं आपके सपने को पूरा नहीं कर पाऊंगा। मैं हार गया।"
"बेटा, तुम मुझे माफ़ कर दो। मैंने अपनी इच्छाओं को तुम पर थोपना चाहा, जब कि तुमने मेरी इच्छाओं का सम्मान किया। मेरी अपेक्षाएं और मेरा लालच तुम्हारी जिंदगी को संकट में डाल देगा, यह मैंने सोचा नहीं था । तुम जो चाहोगे, तुम्हारी जो इच्छा होगी, वही होगा।"
          डॉ. सक्सेना सुनील को घर ले आए। कुछ दिनों बाद सुनील को अहमदाबाद ले गए। उसकी इच्छानुसार बैडमिंटन की कोचिंग में एडमिशन करा दिया। 2 वर्षों की कोचिंग के बाद सुनील राष्ट्रीय स्तर के बैडमिंटन टूर्नामेंट में शामिल होने लगा।

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