4 वर्ष के मोहित को लेकर बिहार से आना, भूली नहीं, खाली ज़मीन पर घर बनवाना। वह घर ईंट, पत्थरों, दीवारों का ही नहीं, घर के हर कोने की कहानी है कही, अनकही। घर की चौखट पर जब नज़रें जाती हैं, हर तस्वीर आँखों में उतर आती है। वह बड़ी-सी छत, खुला आसमान, समेटे था वह घर, सभी के अरमान। कुछ यादों के पन्ने ज़ेहन में घूम रहे आज भी, वो गली-मुहल्ला, गंगाराम का दूध-याद है आज भी। घर में दो बुजुर्ग थे, साया था, छत्र थी, मैं उस घर में एक बड़ी बहू थी। उस बड़े घर की सफ़ाई से थे हम त्रस्त, क्योंकि हमारी बाई थी बहुत सफ़ाई-परस्त। बाई की निगाहें चारों तरफ़ घूमती रहती थीं, झाड़ू-पोंछा होने पर भी कचरा ढूँढ ही लेती थीं। बापूजी का अनोखा अंदाज, रोबीली फ़ितरत थी, गुस्सा आने पर घर छोड़ देने की धमकी-एक आदत थी। यादों का कोई अंत नहीं, यादों को छोड़ूँ कैसे! उस एहसासों के खजाने को बिसराऊँ कैसे! हाँ, वह 'गीता-नंद भवन' हुआ अब पराया, अमुक परिवार ने अमुक नाम से है अपनाया। 10 अक्टूबर 2026।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !